अब विपक्ष किसलिए आलोचना कर रहा ?

अब विपक्ष किसलिए आलोचना कर रहा ?
अब विपक्ष किसलिए आलोचना कर रहा ?

कुछ मसले ऐसे होते हैं, जिस पर आप कुछ भी करें, विपक्ष आपकी आलोचना करेगा ही करेगा। कश्मीर का मसला भी ऐसा ही है। आप देखिए। वहां किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। भाजपा ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई। तब कहा गया कि भाजपा अपने आप को राष्ट्रवाद का चैंपियन मानती है, लेकिन अलगाववादियों और आतंकवादियों का समर्थन करने वाली महबूबा मुफ्ती के साथ मिलकर सरकार बना ली। अगर वह सरकार न बनाती तो चुनाव बेमतलब हो जाते क्योंकि वहां और कोई पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। तब कहा जाता कि लोकतंत्र कायम करने की कोई कोशिश नहीं कर रही भाजपा। इसी तरह जब सरकार चलने लगी तो कहा जाने लगा कि हमारे सैनिक कश्मीर में मारे जा रहे हैं और भाजपा वहां महबूबा के साथ मिलकर सरकार चला रही है। जब अलग हो गए तो कहा गया कि तीन साल मिलकर मलाई खाई और अब जब 2019 के आम चुनाव आ रहे हैं तो बदनामी और विपक्ष के आरोपों से बचने के लिए सरकार से अलग हो गई।

इस साल जून में पीडीपी और भाजपा के गठबंधन में चल रही सरकार गिर गई थी। भाजपा ने राज्य में आतंकवाद बढ़ने का आरोप लगाकर महबूबा मुफ्ती सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। उसके बाद से विधान सभा निलंबित रखी गई थी। उम्मीद थी कि शायद फिर से नई सरकार बन सके। तब सारे दल मांग करते रहे कि विधान सभा भंग करके नए चुनाव कराए जाएं। पर राज्यपाल सतपाल मलिक को उम्मीद थी कि हो सकता है नए चुनाव न कराने पड़ें और कोई दल किसी के साथ मिलकर सरकार बनाने में सक्षम हो जाए। लेकिन जब उन्हें लगा कि यह संभव नहीं रह गया है और सरकार बनाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त की जाने लगी है तो उन्होंने बुधवार को विधान सभा भंग कर दी। अब जो लोग राज्यपाल की इस बात के लिए आलोचना कर रहे थे कि वे विधान सभा नहीं भंग कर रहे हैं, उनकी इस बात के लिए आलोचना करने लगे हैं कि क्यों उन्होंने विधान सभा इतनी जल्दबाजी में भंग कर दी।

दरअसल हुआ ये है कि राज्य में बुधवार को दो लोगों ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। जिनमें एक सज्जाद लोन हैं और दूसरी महबूबा मुफ्ती। सज्जाद लोन ने दावा किया कि उन्होंने नेशनल कान्फ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने के 44 विधायकों के जादुई आंकड़े को पार कर लिया है। उसी तरह महबूबा मुफ्ती ने दावा किया कि कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की मदद से वे सरकार बनाने की स्थिति में हैं। कहा जा रहा है कि पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाकर सरकार बनाने की पहल की। उससे घबराकर केंद्र की भाजपा सरकार ने विधान सभा भंग करा दी। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा नेता राम माधव सज्जाद लोन को मुख्यमंत्री बनाना चाह रहे थे। इसके लिए उनकी नजर पीडीपी के कुछ विधायकों पर थी। पीडीपी के एक बड़े नेता सज्जाद लोन के समर्थन में खुलकर सामने आ गए थे। इससे पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती को लगा कि अगर ये मामला आगे बढ़ेगा तो उनकी पार्टी टूट सकती है। लिहाजा उन्होंने मास्टर स्ट्रोक खेला और राज्यपाल के पास कांग्रेस और एनसी के समर्थन से सरकार बनाने का दावा करते हुए फैक्स भेज दिया। राज्यपाल सतपाल मलिक को जब इन घटनाओं की अपने सूत्रों के जरिए जानकारी मिली तो उन्होंने विवेकसम्मत फैसला लिया और विधान सभा भंग कर दी, ताकि विधायकों की खरीद-फरोख्त न की जा सके।

कायदे से देखा जाए तो पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस तीनों ही विधान सभा भंग कर नए चुनाव कराने की मांग कर रहे थे। इसलिए विधान सभा के भंग होने पर इन्हें खुश ही होना चाहिए कि चाहे जैसे भी हुआ, पर विधान सभा भंग हो गई। राज्यपाल के इस कदम का उन्हें स्वागत करना चाहिए। पर नहीं, उन्हें तो आलोचना करनी है। सो कर रहे हैं। अब वे कह रहे हैं कि भाजपा कश्मीर में महागठबंधन बनते देख घबड़ा गई, इसलिए विधान सभा भंग कर दिया। उसने संविधान का उल्लंघन किया है और इस बात को एक बार फिर से साबित किया है कि वह मानती है कि या तो सरकार उसकी बनेगी या किसी की नहीं बनने देंगे। अरे बुद्धिमान लोगों, ज्यादा माथापच्ची मत करो। जाओ और चुनाव की तैयारी में जुट जाओ। अब तो आपके लिए रास्ता साफ है। जनता आपको चाहेगी आप सरकार बना लेना नहीं तो भाजपा तो बनाएगी ही।