सुरक्षा हटने के बाद भी नहीं बदले बोल

सुरक्षा हटने के बाद भी नहीं बदले बोल

जम्मू कश्मीर में अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा ख़तम कर सरकार ने एक सन्देश देने की कोशिश की है अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा के नाम पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये अब सरकार की तिजोरी में रहेंगे या फिर उन रुपयों को किसी अन्य मद में खर्च किया जायेगा हालांकि अभी तक मात्र छः नेताओं की ही सुरक्षा हटाई गई है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में बाकी नेताओं को दी गई सुरक्षा की नए सिरे से  जांच कर आगे की कार्रवाई की जाएगी

अभी तक जिन नेताओं की सुरक्षा हटाई गई है उनमे से चार हुर्रियत के हैं जबकि एक डीएलपी और एक डीएफपी के हैं इन नेताओं के नाम हैं, मीरवाइज उमर फारुख, अब्दूल गनी बट, बिलाल लोन, फजल हक़ कुरैशी ,हाशिम कुरैशी और शब्बीर शाह इन सभी नेताओं की सुरक्षा में लगे सभी सुरक्षाकर्मी के साथ साथ गाड़ियाँ और सभी सरकारी सुविधाएं भी वापस ले ली गई हैं सुरक्षा हटाने के बाद भी इन नेताओं के बोल वैसे ही हैं जैसा कि पहले थे लगभग सबने ही कहा है कि सुरक्षा हटाने से जम्मू कश्मीर के हालात नहीं बदलेंगें इनकी भाषा शैली यह बताने के लिए प्रयाप्त है कि ये अपने आपको किस कदर मजबूत और स्वतंत्र समझते हैं भारत सरकार से मिली सुरक्षा से शानों शौकत का जीवन व्यतीत करने वाले ये नेता शायद अपने आपको भारत का हिस्सा भी नहीं मानते जबकि जम्मू कश्मीर में जिन नेताओं को सरकार ने सुरक्षा मुहैया कराई है उन पर एक साल में लगभग 112 करोड़ रुपए खर्च किये जाते हैं

अलगाववादी नेताओं में मीरवाइज उमर फारुख की सुरक्षा में सबसे ज्यादा पैसे खर्च होते हैं एक दशक में इसकी सुरक्षा में लगे कर्मियों के वेतन पर 5 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं हालांकि पकिस्तान समर्थक अली शाह गिलानी जिसे सुरक्षा मिली हुई , उसका नाम उन नेताओं में शामिल नहीं है ,जिनकी सुरक्षा हटाई गई है अब सुरक्षा हटाने के नाम पर यह सवाल पूछा जा सकता है कि सरकार ने यह कदम पहले क्यों नहीं उठाया लेकिन देर से ही सही अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा हटाकर सरकार ने सिर्फ देश वासियों को कुछ राहत दी है बल्कि उन नेताओं की स्वतंत्रता भी बाधित हुई है

सुरक्षा हटाने के बाद उन नेताओं के रहे बयान यह बताने के लिए प्रयाप्त हैं कि वो कितने हताश हैं सरकार को एक कोशिश यह भी करनी चाहिए कि बाकि नेताओं की भी जांच कर उनकी भी सुरक्षा जितनी जल्दी हो सके हटा दे