निशंक का हिंदी प्रेम

निशंक का हिंदी प्रेम

मंत्रालय संभालने के दस दिन के अंदर ही मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने एक आदेश जारी करके कहा था कि उनके पास जितनी फाइलें आएं उन पर नोट हिंदी में किया हुआ होना चाहिए। मंत्री के इस आदेश से मंत्रालय में हड़कंप मचा हुआ है। क्योंकि अभी तक आम तौर पर फाइलों में नोटिंग अंग्रेजी में ही हुआ करती थी।

कुछ समय पहले मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर नया प्रस्ताव जारी किया था। उसमें कहा गया था कि हर राज्य को तीन भाषाएं पढ़ाना अनिवार्य है, जिसमें से एक हिंदी होगी। यह प्रस्ताव त्रिभाषा फार्मूले के तहत दिया गया था, जिसमें एक स्थानीय भाषा, दूसरी अंग्रेजी और तीसरी हिंदी होगी। लेकिन जब दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु और कर्नाटक ने इसका विरोध किया तो मंत्रालय को इस पर सफाई जारी करनी पड़ी और कहा गया कि मंत्रालय किसी पर भी हिंदी को थोपेगा नहीं। उसके कुछ ही दिन बाद मंत्री ने हिंदी में नोटिंग वाला यह आदेश जारी किया है। सवाल है कि क्या ऐसा कोई नियम है जिसके तहत हिंदी में नोटिंग करने को कहा जा सकता है? इसका जवाब हां में है। सरकारी भाषा के प्रयोग के मामले में कहा गया है कि कोई कर्मचारी नोट या मिनट हिंदी या अंग्रेजी में रिकॉर्ड कर सकता है और उसे उसका अनुवाद करने की भी जरूरत नहीं है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषाएं हैं। नियम में यह भी कहा गया है कि सरकार कार्यालयों से ये कह सकती है कि फाइलों पर नोटिंग या ड्राफ्टिंग या और भी आधिकारिक कार्य हिंदी में ही किए जाएं, बशर्ते कि उस कार्यालय में हिंदी में सहजता से काम करने वाले पर्याप्त कर्मचारी हों।

इसका मतलब ये हुआ कि वहां काम करने वाले ऐसे कर्मचारी हों, जिन्होंने हाई स्कूल या उसके समकक्ष परीक्षा हिंदी मीडियम से पास की हो। या जिन्होंने डिग्री की परीक्षा में हिंदी एक ऐच्छिक विषय के रूप में लिया हो। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए हिंदी में महारथ हासिल किया होना आवश्यक नहीं है। हालांकि सरकार इस बात के लिए कर्मचारियों को प्रेरित करती है कि वो भाषा की कामकाजी जानकारी रखें। केंद्र सरकार के कर्मचारी मुख्यतया सेंट्रल सेक्रेटरियेट सर्विसेज के होते हैं और इस परीक्षा को पास करने के लिए हिंदी के ज्ञान का होना आवश्यक नहीं है।

निशंक का ये आदेश मंत्रालय में पिछले महीने जारी किया गया था, लेकिन पिछले हफ्ते तक इस पर अमल नहीं हो रहा था। लेकिन अगर मंत्री चाहता है और उसने इस आशय का सर्कुलर जारी कर दिया है तो उसे लागू तो करना ही होगा। उसके बगैर गुजारा नहीं होना है। वरना मंत्री ऐसे व्यक्ति को उस कुर्सी पर बैठाएगा जो उसके आदेशों का पालन कर सके। अगर कोई अफसर हिंदी न आने का बहाना बनाएगा तो उस सूरत में भी वो उस अफसर को लाएगा, जिसे हिंदी आती हो और वह हिंदी में नोटिंग या ड्राफ्ट तैयार करने में सहज हो। दरअसल ये अफसर जान बूझ कर फाइलों पर नोटिंग हिंदी में नहीं करते। उन्हें मालूम है कि ज्यादातर मंत्रियों का हाथ अंग्रेजी में तंग होता है। इसलिए वे अंग्रेजी का आतंक पैदा करके मंत्री को अपने अनुसार चलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन जो तेज तर्रार मंत्री होते हैं, वे उनकी अंग्रेजी के दबाव या भौकाल में नहीं आते। वे अपने अनुसार उन्हें ढाल लेते हैं। फिलहाल निशंक वही कर रहे हैं। इससे पहले एक बार जब भजनलाल कृषि मंत्री बने थे तो उन्होंने भी ऐसा ही किया था। उन्होंने भी जब आदेश जारी किया तो शुरू में अफसरों ने उसे नहीं माना। तब उन्होंने सख्त रुख अख्तियार किया। फिर क्या था। वही अफसर जो कहते थे कि उन्हें हिंदी नहीं आती पूसा इंस्टीट्यूट से हिंदी की पत्रिकाओं के संपादकों को लाकर अपने यहां इज्ज्त से बैठाने लगे ताकि हिंदी में नोटिंग और ड्राफ्टिंग हो सके और वे मंत्री की डांट से बच सकें। साथ ही अपना कैरियर भी बचा सकें।