मुलायम का नाम स्टार प्रचारकों में शामिल करना पड़ा

मुलायम का नाम स्टार प्रचारकों में शामिल करना पड़ा

सोशल मीडिया और भाजपा के दबाव में आजकल विपक्ष की छोटी-छोटी बातें भी बड़ी बन जाती हैं। समाजवादी पार्टी ने अपने 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की। कुछ सोचकर उन्होंने उस सूची में पार्टी के संस्थापक और संरक्षक मुलायम सिंह का नाम नहीं डाला। सबसे ऊपर अखिलेश का नाम था। इसके बाद रामगोपाल यादव, आजम खान, जया बच्चन, डिंपल यादव, राजेंद्र चौधरी आदि के नाम थे। सूची सामने आते ही हंगामा मच गया। ऐसा साबित किया गया कि मुलायम सिंह की उपेक्षा की गई। हाल के कुछ वर्षों में सपा में मचे घमासान और मुलायम अखिलेश के रिश्तों को देखते हुए उपेक्षा की बात चिपका देना आसान लगा। सोशल मीडिया के जरिए यह बात चिपकने भी लगी। यह कहा भी जाने लगा कि जो अपने पिता का नहीं हुआ वह जनता का क्या होगा।

समाजवादी पार्टी ने सूची जारी करते समय इतना कुछ सोचा ही नहीं था। अगर उसे थोड़ी भी आशंका होती तो वह ऐसा नहीं करती। और हुआ भी वही। जैसे ही उसने देखा कि सूची में मुलायम सिंह का नाम न होने को लेकर गदर काटा जा रहा है, उन्होंने दूसरी सूची जारी कर दी, जिसमें पहले नंबर पर मुलायम सिंह का नाम है। बाद में अखिलेश और दूसरे लोगों के नाम हैं। दूसरी सूची जारी होते ही मामला खत्म हो गया।

इसे ही कहते हैं तिल का ताड़ बनाना। आलोचकों को बस बहाना चाहिए। वरना जानते सब थे कि सूची में नाम न देने का क्या मतलब हो सकता है। इस समय मुलायम सिंह 79 साल के हो चुके हैं। स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं है। कब क्या बोल जाते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चल रहा। सौहार्द बस मोदी जी को चुनाव जीतने की ऐसी शुभकामना दे दी कि भाजपा उसे भुनाने लगी है। सपा के गंभीर लोगों का कहना है कि मुलायम सिंह बस परचा भरने जाएंगे। उनसे पार्टी ये भी उम्मीद नहीं कर रही है कि वे अपना खुद का भी चुनाव प्रचार करें। बहुत होगा तो एक-दो सभाओं में चले जाएंगे। उनकी इच्छा भी नहीं है कि वे घूम-घूम कर चुनाव प्रचार करें। उनके स्वास्थ्य, उनकी सहूलियत और उनकी इच्छा को ध्यान में रखकर ही उन्हें स्टार प्रचारकों की सूची में नहीं रखा गया। वे पार्टी के सबसे सम्मानित नेता हैं। अखिलेश के भी वे प्रिय हैं और वे भी अखिलेश को चाहते हैं। इसीलिए भाई के लाख कहने के बावजूद आखिरकार वे खड़े हैं तो बेटे अखिलेश के ही पक्ष में। मीडिया चाहे दुष्प्रचार जितना करे, अखिलेश हमेशा से उनका सम्मान करते रहे हैं और हर बात उन्हें बताकर और उनसे इजाजत लेकर करते हैं। अगर उन्हें मुलायम की उपेक्षा ही करनी होती तो उन्हें संरक्षक क्यों बनाते और फिर चुनावों में टिकट क्यों देते। इतना ही नहीं वे घूम-घूम कर ये भी कहते हैं कि नेता जी को रिकॉर्ड वोटों से जिताने के लिए बसपा से समझौता किया है। उन्होंने गेस्ट हाउस कांड न भूलने वाली मायावती जैसी जिद्दी नेता को नेताजी के प्रचार के लिए भी मना लिया है। तो यहां यही कहना ठीक रहेगा कि बात बहुत छोटी थी। समझें तो कुछ भी नहीं थी। पर मीडिया और सोशल मीडिया को तूल देना था सो दिया।