लोकतंत्र में चुनाव की जगह खेल, कितना जायज ?

लोकतंत्र में चुनाव की जगह खेल, कितना जायज ?

कर्नाटक की जे डी एस और कांग्रेस की लगभग एक साल की सरकार गिर गई। भाजपा के बी एस येदियुरप्पा ने चौथी बार मुख्यमन्त्री पद की शपथ ली। सोमवार को इन्हें बहुमत पेश करना है, जो संभवतः हो ही जाएगा। लेकिन पिछले कुछ महीनों में कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ, कई विधायक अपना राज्य छोड़कर मुंबई जाकर रहे। उसे देखकर वहां की जनता जरुर परेशान हो रही होगी। यह सत्य है कि लोकतंत्र में बहुमत का खेल है। बहुमत से ही सरकारें बनती हैं और बहुमत कम होने पर सरकारें गिर जाती हैं। कर्नाटक विधान सभा चुनाव में भाजपा को 104 सीटें मिलीं थीं। कांग्रेस को 78 जबकि उसकी सहयोगी जे डी एस को 38 सीटें मिलीं थीं। 224 वाले विधान सभा सीट के लिए उस समय 222 सीटों पर ही चुनाव हो पाए थे। क्यों कि नामांकन के बाद एक प्रत्यासी की मृत्यु हो गई थी जबकि एक प्रत्यासी अयोग्य घोषित हो गया था। सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला था। भाजपा अपना बहुमत साबित नहीं कर पायी तो जे डी एस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई। कुमार स्वामी मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भी असंतोष व्याप्त रहा। कांग्रेसी विधायकों और जे डी एस विधायकों के बीच अनबन की ख़बरें आती रहीं। विधायकों की उन बातों और उनकी हरकतों से कई बार कुमार स्वामी परेशान भी हो जाते थे। कई बार उनके रोने की खबरें भी आती थीं। भाजपा बड़ी बारीकी से सारे घटनाक्रम को देख रही थी। भाजपा को इस बात का मलाल था कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद वो सरकार क्यों नहीं बना पाई। चुनाव का परिणाम इस बात का संकेत था कि कर्नाटक की अधिकाँश जनता कांग्रेस और जे डी एस की सरकार चाहती है । लेकिन जहाँ तक सीटों की बात है, तो वहां की जनता ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाकर यह बता दिया था कि उनके लिए भाजपा भी अछूती नहीं है। कर्नाटक में जो 14 महीने पहले हुआ और जो आज हुआ है उसमे अंतर बस इतना ही है कि उस समय सरकार चुनावी आंकड़ों के हिसाब से बनी थी जबकि इस बार कुछ विधायकों के अयोग्य होने और कुछ के पाला बदल लेने की वजह से सरकार बनी है। पहले जो हुआ था वह लोकतंत्र की व्यवस्था के अनुरूप हुआ था, अब जो हुआ है उसे लोकतंत्र के हिसाब से सही नहीं ठहराया जा सकता। पहले जो हुआ था उसे चुनाव कहा जायेगा, इस बार जो हुआ है, उसे निश्चित रूप से खेल कहा जायेगा और लोकतंत्र में खेल हो, यह शायद लोकतंत्र की ख़ूबसूरती और उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं कहा जायेगा। लोकतंत्र में मेनडेट बहुत बड़ी चीज है। कर्नाटक का मेनडेट कांग्रेस और जे डी एस के लिए था। भाजपा की भले ही सरकार बन गई हो लेकिन कहीं न कहीं जनता की हार जरुर हो गई है। लोगों को 2015 का बिहार विधान सभा चुनाव अगर याद हो, तो उन्हें यह भी याद होगा कि वहां की जनता ने लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और नितीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के गठबंधन को बहुमत दिया था। सरकार बनी और राजद ने ज्यादा सीटें हासिल करने के बावजूद नितीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था। कुछ महीनों के बाद गठबंधन टूटा और नितीश कुमार ने भाजपा से मिलकर सरकार बना ली। वहां भी जनता से धोखा हुआ। यानी सीधे शब्दों में कहें तो खेल हुआ। जबकि लोकतंत्र में चुनाव होना चाहिए न कि खेल। राजनैतिक पार्टियों को लगता है कि जनता कुछ नहीं बोलती। नेता खेल करते रहेंगे और जनता चुपचाप देखती रहेगी। वैसे नेताओं की जनता को लेकर ऐसी सोच है तो कोई गलत भी नहीं है। क्योंकि हमारे देश की जनता जिसे वोट देकर सरकार बनाती है। अगर वो सरकार बीच में ही गिर जाती है तो जनता  कहाँ सड़कों पर आकर हंगामा करती है ? जनता कहाँ धरना प्रदर्शन करती है ? जनता की इसी चुप्पी की वजह से राजनीति में खेल होता रहता है। यही खेल मध्यप्रदेश में भी शुरू हो गया है। बसपा के विधायक का आचरण देखकर मायावती भी नाराज हुईं। उन्होंने उसे दिल्ली तलब कर लिया। वहां कमलनाथ की सरकार को बसपा के एक विधायक और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन है। देश में चुनाव के बाद सरकार बनने पर किसी को कोई भी आपत्ति नहीं है। लेकिन राजनैतिक खेल के जरिये सरकार बनाने की परिपाटी किसी भी दृष्टिकोण से सही नही है। भाजपा इस समय देश की सबसे बड़ी पार्टी है। सुचिता की बात करती है। लेकिन दुर्भाग्य वश भाजपा भी इस खेल को रोकने की कोशिश नहीं कर पा रही है। ऐसे में आने वाले समय में लोकतंत्र की तस्वीर कैसी होगी आसानी से समझा जा सकता है।