क्या देश फासिज्म के दरवाजे पर खड़ा है?

क्या देश फासिज्म के दरवाजे पर खड़ा है?

इस समय देश दो हिस्सों में बुरी तरह से बंटा हुआ है। एक तरफ सत्ता पक्ष जहां अपनी जीत पर मगरूर है, वहीं विपक्ष सदमे में है। सत्ता पक्ष जहां लोकतंत्र के मजबूत होने की बात कर रहा है, वहीं विपक्ष लोकतंत्र पर गंभीर खतरे की बात कर रहा है। सत्ता पक्ष के समर्थक जहां अच्छे दिन आने की बात कर रहे हैं, वहीं विपक्ष समर्थक अपनी बात कहने से भी डर रहे हैं कि पता नहीं कब कौन हमला कर दे। संसद के बाहर तो ये सब बातें हो ही रही हैं, तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा ने इन बातों को सूत्रबद्ध करके संसद में भी उठाया। महुआ मोइत्रा पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर से सांसद हैं।

महुआ मोइत्रा ने फासिज्म के सात संकेत बताए हैं। उनका कहना है कि जब किसी समाज में अंध राष्ट्रवाद चलने लगे, मानवाधिकारों पर हमला होने लगे, मीडिया को नियंत्रित किया जाने लगे, चारो तरफ खौफ का माहौल बनाया जाने लगे, जब धर्म और सरकार आपस में घुलमिल जाएं, बुद्धिजीवियों और कलाकारों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगे और उन पर हमले किए जाने लगें तथा चुनाव संदिग्ध हो जाएं तो समझिए कि फासिज्म आ रहा है। उन्होंने कहा कि इस समय जो राष्ट्रवाद की अवधारणा है, वह चरम पर है। यह राष्ट्रवाद बेहद ताकतवर , भभकता और सतत राष्ट्रवाद हमारी राष्ट्रीय पहचान को नष्ट कर रहा है । ये राष्ट्रवाद छिछला है । इसमें दूसरों के लिए दहशत है। ये संकीर्ण है । इसका मकसद हमें जोड़ना नहीं, बांटना है । देश के नागरिकों को उनके घर से निकाला जा रहा है। उन्हें घुसपैठिया कहा जा रहा है। पचासों साल से यहां रह रहे लोगों को ये साबित करना पड़ रहा है कि वो भारतीय हैं । ऐसे देश में जहां मंत्री कॉलेज से ग्रेजुएट होने का सबूत देने के लिए अपनी डिग्री नहीं दिखाते वहां आप गरीबों से उम्मीद करते हैं कि वो अपनी नागरिकता साबित करें। आखिर वो कैसे नागरिकता साबित करें। जिसने न पढ़ा हो न लिखा हो, न उसका घर हो न दुआर हो और उसने कोई कागज भी संभाल कर न रखा हो तो वो कैसे अपनी नागरिकता साबित कर सकता है। हमसे नारे लगाकर देश के प्रति अपनी वफादारी साबित करने की बात कही जा रही है, पर सच तो यह है कि कोई ऐसा एक नारा ही नहीं है, जिसे लगाने के बाद देशभक्ति साबित की जा सकती है।

लोक सभा में जीत के बाद सरकार बेहद आक्रामक है। उसकी कार्यशैली में हर स्तर पर मानवाधिकारों के लिए तिरस्कार की प्रबल भावना है । 2014 से 2019 के बीच हेट क्राइम में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। किसी पर कुछ भी आरोप लगाकर दिनदहाड़े लोग उसे मार दे रहे हैं। पिछले साल राजस्थान में मॉब लिंच हुए पहलू खान से लेकर झारखंड में मारे गए तबरेज़ अंसारी तक, ये हत्याएं रुक ही नहीं रही हैं। कुछ पुलिस वालों को भी इसका शिकार होना पड़ा है। सही बातें लोगों तक न पहुंचे और मनचाही बातें उन तक पहुंचाई जा सकें, इसके लिए मीडिया को बड़े पैमाने पर नियंत्रित किया जा रहा है । देश के सबसे बड़े पांच न्यूज मीडिया संस्थान आज या तो अप्रत्यक्ष रूप से कंट्रोल किए जा रहे हैं या वो एक व्यक्ति के लिए समर्पित हैं । टीवी चैनल्स अपने एयरटाइम का ज्यादातर हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के लिए प्रोपगेंडा में खर्च कर रहे हैं । सारे विपक्षी दलों की कवरेज काट दी जाती है। इसके लिए सरकार की ओर से दिए जा रहे विज्ञापनों का प्रयोग किया जा रहा है। जो लोग सरकार के कहने पर काम नहीं कर रहे हैं और सचाई को उजागर कर रहे हैं, उनके विज्ञापन रोक दिए जा रहे हैं। सरकार का इतने से ही मन नहीं भर रहा है। इसके बावजूद कोई मीडिया संस्थान गड़बड़ी न कर बैठे, उस पर निगरानी के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 120 से ज्यादा लोगों को बस इसलिए नौकरी पर रखा है कि वो रोज़ाना टीवी चैनलों पर आने वाले कार्यक्रमों पर नज़र रखें । इस बात को सुनिश्चित करें कि सरकार के खिलाफ कोई ख़बर न चले । फेक न्यूज़ तो आम हो गया है। और वे सब लोग सत्ता पक्ष की विचारधारा से लैस हैं। सरकार और उसके नेता झूठी बातों को बार-बार दोहरा कर लोगों के दिमाग में ऐसे बैठा रहे हैं जैसे वही सच हो।

देश का माहौल ऐसा बना दिया गया है कि लोग किसी अनजान से काले भूत के ख़ौफ़ में हैं । सब जगह डर का माहौल है । सेना की उपलब्धियों को एक व्यक्ति के नाम पर भुनाया और इस्तेमाल किया जा रहा है । हर दिन नए दुश्मन गढ़े जा रहे हैं। जबकि पिछले पांच साल में आतंकवादी घटनाएं काफी बढ़ी हैं । कश्मीर में शहीद होने वाले जवानों की संख्या में 106 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। एक जमाने में अकालियों के लिए कहा जाता था कि वे धर्म और सरकार को आपस में गड्डमड्ड कर रहे हैं। लेकिन अब तो यह बात पूरे देश पर लागू हो रही है। देश में धर्म और सरकार एक-दूसरे में गुंथ गए हैं । देश में नागरिक होने की परिभाषा ही बदल दी गई है। एनआरसी और नागरिकता संशोधन (सिटिजनशिप अमेंडमेंट) बिल लाकर हम ये सुनिश्चित करने में लगे हैं कि इस पूरी प्रक्रिया के निशाने पर बस एक खास समुदाय आए ।

सबसे ख़तरनाक है इस समय बुद्धिजीवियों और कलाकारों के लिए तिरस्कार की भावना। विरोध और असहमतियों को दबाया जा रहा है। बुद्धिजीवियों को पुरस्कार लौटाऊ गैंग कहकर अपमानित किया जाता है। स्कूली किताबों में छेड़छाड़ की जा रही है। लोगों को अब सवाल पूछने की भी आजादी नहीं है। विरोध की तो बात ही कोई नहीं कर सकता।

महुआ मोइत्रा के इस भाषण को काफी सराहा गया। जब इसकी ज्यादा सराहना होने लगी तो एक चैनल से यह भी बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने आरोप लगाया कि यह भाषण किसी और का है और चोरी करके संसद में पढ़ा गया है। जिस व्यक्ति के भाषण की बात चैनल ने कही जब उस व्यक्ति को पता चला तो उसने इस बात का चैनल का मजाक उड़ाते हुए खंडन किया। जो पत्रकार ये आरोप लगा रहा था वो खुद मीडिया के जरिए ब्लैकमेलिंग के मामले में जेल की हवा खा चुका है। महुआ मोइत्रा ने मीडिया पर जो आरोप लगाया है, उसका ये जीता जागता उदाहरण है। बाकी आप खुद भी तय करें कि इन बातों में कितनी सचाई है और क्या देश सचमुच तानाशाही के दरवाजे पर खड़ा है।