कर्नाटक में रिसॉर्ट राजनीति

कर्नाटक में रिसॉर्ट राजनीति

कर्नाटक में राजनीति बहुत तेजी से घूम रही है। वहां करीब पिछले एक साल से कांग्रेस और जद एस की सरकार है, लेकिन बहुत मामूली अंतर से। वहां विधान सभा की कुल 224 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए 113 विधायकों की जरूरत होती है। पिछले विधान सभा चुनावों में वहां भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। उसके 104 विधायक जीते। दूसरे नंबर पर कांग्रेस रही, जिसके 79 विधायक रहे। तीसरे नंबर पर जद एस रही जिसके कुल 37 विधायक जीते। इन चुनावों से पहले वहां कांग्रेस की सरकार थी और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री थे। लेकिन जब कांग्रेस ने देखा कि वो पिछड़ गई है तो भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के लिए उसने जद एस को समर्थन दे दिया। जद एस के कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने और कांग्रेस सत्ता में शामिल हुई। संख्या बल के हिसाब से करीब दो दर्जन मंत्री कांग्रेस के हैं और दर्जन भर जद एस के।

यह बात भाजपा को काफी अखरी। उसे लगा सत्ता उसके हाथ में आते-आते रह गई है। सबसे बड़ी पार्टी बनके उभरने के बावजूद उसे विपक्षी बेंच पर बैठना पड़ रहा था, जबकि केंद्र में उसी की सरकार थी। इसलिए उसे जब भी मौका मिलता है वह सरकार बनाने की कोशिश में जुट जाती है। इससे पहले भी वो दो बार सरकार बनाने की कोशिश कर चुकी है, पर उसे सफलता नहीं मिली। इस बार हुए लोकसभा के चुनावों में बीजेपी ने वहां शानदार प्रदर्शन किया। चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी नेता येदुरप्पा कह रहे थे कि अगर राज्य में हम 22 सीटें जीते तो कांग्रेस जद एस की बजाय महीने भर के भीतर भाजपा की सरकार होगी। वहां बीजेपी को 22 से भी ज्यादा सीटें मिलीं। तभी से यह आशंका जताई जा रही थी कि अब कर्नाटक में सत्ता का नाटक शुरू होगा। अब वह आशंका सच साबित हुई है। कांग्रेस, जद एस और एक निर्दलीय को मिलाकर कुल 13 विधायकों ने सरकार के खिलाफ मोर्चेबंदी कर दी है। बताया जा रहा है कि सरकार का समर्थन करने वाले 11 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और इसकी जानकारी राज्यपाल को देने के बाद वे मुंबई चले गए हैं। वे जिस चार्टर विमान से गए वह भी भाजपा के एक नेता की कंपनी का है। इन विधायकों को इसीलिए मुंबई ले जाया गया क्योंकि वहां बीजेपी की सरकार है और कांग्रेस तथा जद एस के नेता वहां नहीं पहुंच सकते। इन 13 विधायकों के सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद सरकार पर संकट गहरा गया है। जद (एस)-कांग्रेस की गठबंधन सरकार के विधानसभा में कुल 118 विधायक थे। इनमें इस्तीफा दे चुके विधायक भी शामिल थे। इन 118 विधायकों में से अध्यक्ष के अलावा 78 कांग्रेस के, 37 जद (एस) के, बसपा का एक और दो निर्दलीय विधायक हैं। सदन में भाजपा के 105 विधायक हैं। अब अगर विधायकों के इस्तीफे स्वीकार होते हैं तो गठबंधन के सदस्यों की संख्या 105 पर आ जाएगी। अध्यक्ष का भी एक मत है।

अब दोनों तरफ से जोर आजमाइश हो रही है। बीजेपी जहां इस्तीफा देने वाले विधायकों को लेकर मुंबई चली गई है वहीं अपने विधायकों को भी वहीं किसी सुरक्षित जगह पर ले जाने की सोच रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस, जद एस के लोग अपने नाराज विधायकों को मनाने में जुटे हैं। दरअसल ये पूरा मामला कांग्रेस के एक विधायक राम लिंगा रेड्डी को मंत्री न बनाए जाने को लेकर शुरू हुआ है। राम लिंगम रेड्डी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और सात बार के विधायक हैं। उन्हें तो मंत्री नहीं बनाया गया जबकि उनसे नए लोगों को मंत्री पद दे दिया गया। इससे वे नाराज बताए जा रहे हैं। उनकी इसी नाराजगी का भाजपा ने फायदा उठाया। कहा जा रहा है कि उनके साथ चार और लोग हैं। कांग्रेस उन्हीं को मनाने की कोशिश कर रही है। अगर वो मान जाते हैं तो बीजेपी की यह कोशिश भी बेकार जाएगी। पता चला है कि कांग्रेस ने उन्हें उप मुख्यमंत्री और शहरी विकास मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया है। उनके बाकी चार साथियों के लिए भी व्यवस्था बनाई जा रही है। उन्हें मंत्रिमंडल में जगह देने के लिए कांग्रेस और जदएस के सभी मंत्रियों से इस्तीफा ले लिया गया है। जद एस के विधायकों को बीजेपी की पहुंच से बचाने के लिए कुर्ग के पास एक रिसॉर्ट में भेजा जा रहा है। कांग्रेस के विधायकों को भी बंगलुरू के पास के ही किसी रिसॉर्ट में रखा जाएगा।

दोनों तरफ से सेनाएं सज चुकी हैं। देखना ये है कि जीत किसकी होती है। कांग्रेस, जद एस अपनी सरकार बचाने में सफल होते हैं या येदुरप्पा अपनी ताजपोशी करा पाते हैं।