जघन्य अपराध पर राजनीति क्यों ?

जघन्य अपराध पर  राजनीति क्यों ?

उन्नाव रेप काण्ड ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस घटना ने पुलिस, प्रशासन और सरकार की तस्वीर धूमिल कर दी है। उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारों के समय भी बहुत सी ऐसी घटनाएं हुईं, जिनको लेकर उन सरकारों को कटघरे में खड़ा किया गया। एक समय ऐसा भी आया कि उत्तर प्रदेश में जंगल राज होने की बात कही जाने लगी। तमाम मिडिया चिल्ला–चिल्ला कर जंगल राज की बात करता था। लेकिन आज जो हुआ है उसने जंगल राज को बहुत पीछे छोड़ दिया है। लगभग दो साल पहले हुए इस सामूहिक दुष्कर्म के मामले को खूब तोड़ा और मरोड़ा गया। राजनैतिक स्तर पर, प्रशासनिक स्तर और पुलिस के स्तर पर किस तरह इस मामले को दबाया गया, उसे पूरी दुनिया ने देखा। दुर्भाग्य इस बात का है कि यह मामला तब हुआ जबकि उत्तर प्रदेश में सुचिता वाली पार्टी यानि भाजपा की सरकार है। आदित्य नाथ योगी जैसा व्यक्ति मुख्यमंत्री है। इस घटना की कवरेज विदेशी मिडिया में भी हो रही थी। इस बात को भलीभांति उत्तर प्रदेश की पुलिस और उत्तर प्रदेश की सरकार जानती थी बावजूद इसके एक विधायक के आगे सारा तंत्र बौना बन गया था। क्यों ? सिर्फ इसलिए कि वह आरोपी विधायक भाजपा का था। पार्टी की छवि को बचाने और अपने विधायक को निर्दोष साबित करने के चक्कर में अंतर्राष्ट्रीय मंच पर देश की छवि धूमिल कर दी गई। विदेशी मिडिया अपनी रिपोर्टिंग में भारत के बारे में क्या–क्या लिख रहा है किसी को पता है? पीडिता के पिता की पुलिस कस्टडी में संदिग्ध मौत हो गई। किसी को फर्क नहीं पड़ा। बहुत दबाव बना तो सी बी आई जांच की सिफारिस की गई। पीड़ित लड़की ने निराश और हताश होकर मुख्यमंत्री के आवास के सामने खुदकुशी करने की कोशिश की। सरकार शायद उस समय भी जाग गई होती तो आज कम से कम दो लोगों, पीडिता की चाची और उसकी मौसी की सड़क दुर्घटना में मौत नहीं हुई होती। हालांकि सड़क दुर्घटना को लेकर अभी जांच होनी बाकी है, लेकिन उसे आम सड़क दुर्घटना नहीं कहा जा सकता। पीडिता के तरफ से लिखे गए 35 पत्रों के जवाब में पुलिस का यह कहना है कि 35 नहीं बल्कि पीडिता ने 25 पत्र लिखे थे। सुनकर ऐसा लगता है जैसे कार्यवाई करने के लिए 25 पत्र नाकाफी हैं। पीडिता ने 12 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीस को भी पत्र लिखा था। भला हो हमारे देश की सुप्रीम कोर्ट का, जिसने संज्ञान लिया और आज आरोपी विधायक और उसके गुर्गों को सजा देने की प्रक्रिया शुरू हो गई। जिस देश में "बेटी बचाओ बेटी पढाओ" के नाम पर हजारों लोग देश के कोने–कोने में कुछ न कुछ कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं, आज वहां एक बेटी जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही है। वो भी सिर्फ इसलिए कि उसने अपने ऊपर हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई। कहाँ है देश की वो महिला सांसद। देश की उन महिला सांसदों को सिर्फ अपनी महिला सांसद की इज्जत दिखाई पड़ती है। उन्हें सिर्फ अपनी महिला सांसद का सम्मान दिखाई देता है। खैर अब मामला सुप्रीम कोर्ट में आ गया है। सभी मामलों की सुनवाई अब यहीं होगी। 45 दिनों के अंदर इस मामले का ट्राइल हो जाना है। जिस हिसाब से सुप्रीम के चीफ जस्टिस ने गंभीरता दिखाई है, उसे देखकर यही लगता है कि विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और उसके गुर्गों को शायद तीन माह के भीतर सजा हो जाये। लेकिन न्याय मिलने के बाद भी पीडिता को इस बात का मलाल जिन्दगी भर रहेगा कि न्याय मिला भी तो अपने परिवार के तीन लोगों की कुर्बानी देकर।