एनएमसी से डॉक्टरों की नाराजगी के मायने

एनएमसी से डॉक्टरों की नाराजगी के मायने

नेशनल मेडिकल कमीशन बिल दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब एम् सी आई का अस्तित्व ख़तम हो गया। एम् सी आई यानि मेडिकल काउन्सिल आफ इण्डिया मेडिकल कालेजों की उच्च गुणवता का मानक तय करता था। एम् सी आई को राष्ट्रपति ने 15 मई 2010 को भंग कर दिया था। तबसे एक गवर्निंग बाडी इसका संचालन कर रही थी। 2010 में एम् सी आई के अध्यक्ष को सी बी आई ने भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया था। निति आयोग की एक रिपोर्ट पर केंद्र सरकार ने एम् सी आई की जगह नेशनल मेडिकल काउन्सिल बनाने का फैसला किया। अब मेडिकल कालेजों की मान्यता, डाक्टरों का रजिस्ट्रेशन आदि कार्य यह कमीशन देखेगा। इस बिल के पारित होने के बाद देश भर के डाक्टर नाराज हैं, पिछले कई दिनों से हड़ताल कर वो सरकार से बिल वापस लेने की मांग कर रहे हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर इस बिल में ऐसा क्या है, जो देश के डाक्टरों को हड़ताल पर जाने को मजबूर कर दिया है।

1933-34 में बना एम् सी आई अब तक देश भर के मेडिकल कालेजों की गुणवता पर नजर रख रहा था। नए मेडिकल कालेजों को मान्यता देने का काम कर रहा था। डाक्टर की डीग्री ले चुके छात्रों को प्रैक्टिस करने की अनुमति प्रदान कर रहा था। हालांकि समय -समय पर इसमें कई बार संसोधन किये गए लेकिन इसके बुनियादी ढाँचे को कभी नहीं छेडा गया। अब यह सारा काम नेशनल मेडिकल काउन्सिल करेगा। पहले बताते हैं कि देश भर के डाक्टर इस नए बिल से नाराज क्यों हैं। नए बिल के मुताबिक अब इसके अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। पहले डाक्टरों का एक पैनल अध्यक्ष बनाता था। यानि डाक्टरों की मोनोपोली चलती थी। नए बिल में एक ब्रिज कोर्स का प्राविधान किया गया है। इस कोर्स को करने के बाद अब होमियोपैथ, आयुर्वेद और यूनानी डीग्री धारक भी एलोपैथ की प्रैक्टिस करने के लिए अधिकृत हो जायेंगे। झोला छाप डाक्टरों के लिए छ माह की ट्रेनिंग का प्राविधान रखा गया है। इस ट्रेनिंग को करने के बाद कोई भी व्यक्ति एलोपैथ प्रैक्टिस करने को स्वतंत्र हो जायेगा। नेशनल मेडिकल कमीशन बिल में यह प्राविधान संभवतः इस उद्देश्य से किया गया है कि देश के लाखों ऐसे डाक्टर हैं जिनके पास डाक्टरी की डीग्री नहीं है लेकिन वो प्रैक्टिस कर रहे हैं। शायद ऐसे डाक्टर छ माह का कोर्स कर आसानी और बिना डर के प्रैक्टिस कर पायेंगे। सरकार की शायद यही मंशा रही होगी कि झोला छाप डाक्टर प्रैक्टिस तो कर ही रहे हैं ,क्यों न उन्हें रेगुलर कर दिया जाए`। हालांकि देश भर के डाक्टर इसे गलत मान रहे हैं। उनका कहना है कि झोला छाप डाक्टरों को अगर प्रैक्टिस की अनुमति दे दी गई तो ये लोग मरीजों के जीवन से खिलवाड़ करने लगेंगे। डाक्टरों की दलील न सिर्फ बेबुनियाद है बल्कि अव्यवहारिक भी है। झोला छाप डाक्टर वर्षों से ऐसे ही प्रैक्टिस कर रहे हैं। देश भर के डाक्टर उन झोला छाप डाक्टरों के बारे में जानते भी हैं बावजूद इसके उन्होंने या एम् सी आई ने उन पर लगाम क्यों नहीं लगाईं। जब उन्हें पता है कि झोला छाप डाक्टर मरीजों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे है तो उन्हें रोकने के लिए एक बार भी हड़ताल क्यों नहीं की। आज जब नया बिल पारित हो गया तो हडताल कर रहे हैं। डाक्टरों के इस रवैये से उनमे व्यक्तिगत स्वार्थ की बू आ रही है। नए बिल के मुताबिक़ अब कोई भी डाक्टर तभी प्रैक्टिस कर पायेगा जब वो आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा को पास कर लेगा। हालांकि यह नियम पहले भी था, लेकिन उन डाक्टरों के लिए जो विदेश से डीग्री लेकर इण्डिया में प्रैक्टिस करना चाहते थे। इस नए नियम से कम से कम देश के उन डाक्टरों को को खुश होना चाहिए था जिन्होंने देश के नामी मेडिकल कालेजों से पढ़ाई की है। क्योंकि दिल्ली का एम्स, बनारस का बी एच यू ,पुणे का मेडिकल कालेज ,लखनऊ का किंग जार्ज और देश भर के तमाम सरकारी मेडिकल कालेजों में पढने वाले छात्रों को उस टेस्ट को पास करना उतना ही आसान है जितना यह जानना कि हमारे देश की राजधानी दिल्ली है। हाँ, प्राइवेट मेडिकल कालेजों में पढने वाले छात्रों को टेस्ट पास करने में दिक्कत आ सकती है। कुछ प्राइवेट मेडिकल कालेजों के अलावा बाकी प्राइवेट मेडिकल कालेजों की स्थिति से हर कोई वाकिफ होगा। कई ऐसे मेडिकल कालेजों को मान्यता दे दी गई जिनके पास आधारभूत ढांचा भी नही था। कई मेडिकल कालेजों में फैकल्टी के नाम पर खाना पूर्ति हुई है। 2010 में जब सी बी आई ने तत्कालीन एम् सी आई अध्यक्ष केतन देसाई को गिरफ्तार किया था तब कुछ ऐसे ही मामले उजागर हुए थे । पूरे देश को पता लग गया था कि मोटे पैसे लेकर कैसे किसी भी कालेज को मेडिकल कालेज चलाने की अनुमति दे दी जाती है। केतन देसाई ने मान्यता देने के नाम पर एक कालेज से उस समय दो करोड़ रूपये लिए थे। इस बिल का विरोध देश के कुछ मुट्ठी भर डाक्टर ही कर रहे हैं ,बाकी तो उनके बुलावे पर उनके साथ शामिल हो गए हैं। मुट्ठी भर डाक्टर भी वहीँ है जो वर्षों से एम् सी आई में अपनी मोनोपोली चला रहे थे। एम् सी आई के नाम पर देश के कुछ डाक्टर्स बिना प्रैक्टिस किये लाखों करोड़ों कमा रहे थे। इस बिल के कानून बनते ही उनकी कमाई हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।

एम् सी आई यानि मेडिकल काउन्सिल आफ इण्डिया एक संवैधानिक संस्था थी। फर्क इतना था कि उसके अध्यक्ष डाक्टरों के एक पैनल द्वारा बनाए जाते थे । लेकिन जो नया बिल है ,उसमे अध्यक्ष बनाने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार की होगी। लेकिन आज भी बुनियादी सवाल यही है क्या नेशनल मेडिकल काउन्सिल उन मानकों पर खरा उतरेगा जिसके इसे बनाया गया है। एम् सी आई का भी गठन इसीलिए किया गया था कि वो मेडिकल कालेजों की गुणवत्ता बनाये रखे। उन्ही नए मेडिकल कालेजों को मान्यता दे जिनका आधारभूत ढांचा इस योग्य हो ताकि वहां से अच्छे डाक्टर्स निकल सकें। सरकार की निगाह में एम् सी आई अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने में असफल साबित हुआ बल्कि सरकार ने यह भी मह्शूश किया कि एम् सी आई में बैठे कुछ लोगों ने उस अवैध कमाई का अड्डा बना लिया। अब सरकार एक नया बिल लेकर आई है , दोनों सदनों से बिल पास हो गया। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून की शक्ल ले लेगा। तो क्या अब मान लेना चाहिए कि मेडिकल कालेजों की मान्यता देते समय कोई धांधली नहीं होगी? क्या यह मान लेना चाहिए कि उन डाक्टरों का पंजीकरण नहीं होगा जो उस लायक नहीं है कि प्रैक्टिस कर सकें? क्या यह मान लेना चाहिए कि नेशनल मेडिकल कमीशन में बैठने वाले लोग दूध के धुलें होंगे? क्या यह मान लेना चाहिए कि अब देश के सरकारी मेडिकल कालेजों जैसे ही प्राइवेट मेडिकल कालेज भी हो जायेंगे? क्या अब मान लेना चाहिए कि देश में ही अब ऐसे डाक्टर्स बनने लगेंगे जो विश्वस्तरीय होंगे? ऐसे अनेकों सवाल हैं जो आज भी मौजूद है, और यह सवाल तब तक उठते रहेंगे जब तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यावाहारिक रूप से कुछ अच्छा नहीं दीखने लगेगा।