देश हित मे नहीं है बुद्धिजीवियों का टकराना

देश हित मे नहीं है बुद्धिजीवियों का टकराना

देश के कुछ बुद्धिजीवियों ने माब लिंचिंग को लेकर जब प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी तो तरह – तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कुछ लोगों ने इसे प्रधानमंत्री की छवि ख़राब करने वाली करतूत बता दी तो कुछ लोगों ने कहा कि इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की नेगेटिव तस्वीर बनेगी। अभी उन बुद्धिजीवियों की चिट्ठी पर वाद – विवाद हो ही रहा था, उसके पहले देश के कुछ और सेलिब्रिटी इस लाइन में खड़े हो गए। इन्होने उन बुद्धिजीवियों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। इन्होने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर यह बताने की कोशिश की है कि वो बुद्धिजीवी देश हित की बात नहीं कर रहे हैं। माब लिंचिंग को लेकर लिखी गई चिट्ठी के विरोध में जिन सेलिब्रिटीज ने चिट्ठी लिखी है। उनमे कुछ बड़े नाम भी हैं। प्रसून जोशी, कंगना रनौत, सोनल मान सिंह, मधुर भंडारकर अशोक पंडित और पंडित विश्व मोहन भट्ट जैसे कुल 61 लोगों के नाम हैं उस चिट्ठी में। इन्होने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि उन बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री के प्रयासों को नीचा दिखाने के लिए ही चिट्ठी लिखी थी। अब बात चिट्ठी लिखने भर की नहीं है। संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है। संसदीय भाषा में देश का कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकता है। किसी की भावनाएं आहत किये वगैर कोई भी व्यक्ति अपना विचार व्यक्त कर सकता है। लोकतान्त्रिक देश में सहमती और असहमति के भाव समान रूप से दिखाई पड़ सकते हैं। जहाँ तक उस चिट्ठी की बात है, जिसे देश के कुछ बुद्धिजीवियों ने लिखी थी। जिसमे मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल, मणिरत्नम और शुभा मुद्गल जैसी हस्तियाँ शामिल थीं, उन्होंने चिट्ठी के जरिये बड़ी शालीनता पूर्वक अपनी चिंता व्यक्त की थी। जय श्री राम के नाम पर होने वाली घटनाओं पर चिंता व्यक्त की थीं। प्रधानमंत्री से उन घटनाओं पर रोक लगाने की मांग की थी। उन्होंने चिट्ठी के जरिये किसी को अपमान करने की कोशिश नहीं की थी। उन्होंने किसी की भावनाएं भी आहत नहीं की थीं। बावजूद इसके उन सब पर देश विरोधी कार्य करने का आरोप लग गया। माब लिंचिंग के विरोध में चिट्ठी लिखने वाले बुद्धिजीवी और उन बुद्धिजीवियों के खिलाफ खड़े हुए सेलिब्रिटी, दोनों ही पक्षों का देश के लिए कुछ न कुछ योगदान है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से कुछ ऐसा सृजनात्मक कार्य कर रहे हैं, जिसके चलते देश विदेश में भारत की एक अच्छी तस्वीर बन रही है। लेकिन एक मामले पर देश की इन हस्तियों का आपस में इस तरह टकराना कहीं से भी जायज नहीं लगता। दोनों पक्षों में से किसी को भी कमतर करके नहीं आँका जा सकता। फिर यह टकराहट क्यों ? अगर सरकार के काम से कोई सहमत नहीं है तो क्या वो सवाल नहीं उठा सकता ? किसी समस्या को लेकर अगर कोई सवाल उठाता है तो उसे पहली ही नजर में कैसे गलत कह सकते हैं। माब लिंचिंग को लेकर अगर देश के कुछ बुद्धिजीवियों ने सवाल उठाया है तो उन्हें सरकार की तरफ से कुछ अस्वासन भी दिया जा सकता था। उनकी चिंता, उनकी पीड़ा को सूना जा सकता था। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि वगैर उनकी बात सुने हमारे देश की मिडिया ने उन बुद्धिजीवियों की कापी जांच दी। मजे की बात यह रही कि हमारे देश की मिडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मिडिया ने उनकी कापी ही नहीं जाँची बल्कि उन्हें बुरी तरह से फेल भी कर दिया। जबकि बुद्धिजीवियों ने अपनी चिट्ठी में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं किया था कि प्रधानमंत्री मोदी की वजह से मॉब लिंचिंग की घटनाएं हो रही है। लेकिन देश के लोगों ने उनकी खिलाफत करके जरूर मोदी की छवि को खराब करने की कोशिश की। नतीजा यह हुआ कि आज उन बुद्धिजीवियों के खिलाफ देश का एक और पक्ष उनके खिलाफ खड़ा हो गया। बेहतर तो यह होता कि जिन बुद्धिजीवियों ने सबसे पहले प्रधानमन्त्री को चिट्ठी लिखी थी, उनसे सरकार का कोई व्यक्ति मिल लेता, उनकी चिंता से अवगत हो जाता। उन्हें अस्वासन दे देता, शायद बात ख़तम हो जाती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। दूसरी तरफ देश का एक खेमा और तैयार हो गया। देश मोदी से यह उम्मीद कर रहा है कि वो सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास वाले कथन को सार्थक करें।