भाजपा से खुद दूर हुई और कांग्रेस-एनसीपी भाव नहीं दे रहे

भाजपा से खुद दूर हुई और कांग्रेस-एनसीपी भाव नहीं दे रहे

शिवसेना महाराष्ट्र में बुरी तरह से फंस गई है। अपनी ताकत वह जानती है। राज्य में हुए उप चुनावों और स्थानीय चुनावों ने उसे बखूबी ये एहसास करा दिया है कि अगर वह अकेले चुनाव में उतरी तो रसातल में चली जाएगी। पर उसकी दिक्कत यह है वह अपनी कार्यकारिणी में प्रस्ताव पास कर के कह चुकी है कि वह आगामी लोक सभा और विधान सभा चुनावों में अकेले चुनाव लड़ेगी। उसी बात को पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपनी पंढरपुर रैली में भी दोहराया। पार्टी के दूसरे नंबर के नेता संजय राउत ने भी यही बात कही। हालांकि वे कांग्रेस और एनसीपी की ओर फिलर भी भेज रहे हैं कि वह उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। यह फिलर राज्य और केंद्र दोनों के ही स्तर पर भेजा जा रहा है। पर दिक्कत ये है कि उसके फिलर को दोनों ही पार्टियां नजरंदाज कर रही हैं। राज्य स्तर पर भी और केंद्र स्तर पर भी।

अहमद नगर के स्थानीय चुनावों का हाल आपको मालूम है। वहां शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसके 24 पार्षद जीते। ज्यादा उम्मीद यही थी कि मेयर उसी का चुना जाएगा। पर हुआ अजूबा। कांग्रेस और एनसीपी ने दूसरी नंबर की पार्टी भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देकर उसका मेयर चुनवा दिया। जबकि भाजपा के महज 14 पार्षद ही जीते थे। अब खुलासा ये हुआ है कि शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस से समर्थन मांगा था। लेकिन इन दोनों ही पार्टियों ने उसे कोई महत्व नहीं दिया। शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता रामदास कदम ने खुलकर स्वीकार किया है कि उन्होंने कांग्रेस और एनसीपी से अपना मेयर चुनवाने में मदद मांगी थी। पर मदद नहीं मिली। इस बात की पुष्टि शिवसेना के एक दूसरे नेता ने भी की। उसने कहा कि कदम के कदमों के बारे में उसे पता है, पर वह इस मामले में कुछ बोलना नहीं चाहते। इसी तरह केंद्र में भी शिवसेना कांग्रेस का साथ दे रही है। राफेल मामले में मंगलवार को हुई बहस में कांग्रेस के साथ ही शिवसेना ने भी जेपीसी की मांग की और पूछा कि आखिर सब कुछ सही है तो सरकार जेपीसी बनाने से घबड़ा क्यों रही है। पर कांग्रेस और एनसीपी वहां भी उसे महत्व नहीं दे रहे। उनका मानना है कि शिवसेना के साथ उनके वैचारिक मतभेद हैं और सिर्फ वे दोनों ही मिलकर चुनाव लड़ेंगे। उसमें शिवसेना के लिए कोई जगह नहीं है।

शिवसेना को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए। उसे जितना मान-सम्मान भाजपा दे सकती है, दूसरी कोई पार्टी नहीं। वह शिवसेना की पुरानी सहयोगी है। उसका कहना भी गलत नहीं है। वह शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ने को तैयार है। बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे बराबर की हैसियत देना चाहती है। शिवसेना को चाहिए कि अहंकार त्यागकर उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर ले। वरना उसका अहंकार चूर-चूर होते देर नहीं लगेगी।