35 A हटाने की पृष्ठभूमि हो गई है तैयार !

35 A हटाने की पृष्ठभूमि हो गई है तैयार !

तीन तलाक बिल राज्य सभा से पास हो जाने के बाद अब इसका कानून बनना तय है। यह बिल लोकसभा से पहले ही पारित हो चूका था। राज्यसभा से पास होने को लेकर संसय इसलिए बरकरार था, क्योंकि राज्यसभा में एन डी ए का बहुमत नहीं है। बिना बहुमत के इस बिल को राज्यसभा से पारित करवा लेना प्रधानमन्त्री मोदी की एक उपलब्धि ही मानी जाएगी। उनकी टीम के अन्य मंत्रियों की कार्यकुशलता भी इससे परिलक्षित होती है। बिल पारित होने के बाद तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। प्रतिक्रिया व्यक्त करने वालों में मुस्लिमों के साथ हिन्दुओं की भी अच्छी खासी संख्या है। मुस्लिम तो अपने मजहब को आधार बनाकर इस बिल की आलोचना कर रहें है, लेकिन हिन्दुओं को यह लग रहा है कि आज देश में तमाम तरह की समस्यायें हैं, पार्टी के कई और भी वादे हैं जिन्हें भाजपा को पूरे करने हैं, फिर तीन तलाक पर इतनी हड़बड़ी क्यों ?

किसी भी काम को करने के लिए सरकार को बहुत सी चीजों को देखना होता है। सरकार बनने का यह कतई मतलब नहीं होता कि आप जो चाहें वो कर लें। देश में लोकतान्त्रिक प्रणाली है। देश में एक संविधान है। सभी को उसी संविधान और उसी लोकतान्त्रिक ढांचें में रहकर किसी भी कानून को बनाने की मजबूरी होती है। देश के अधिकाँश लोगों को पता है कि संसद के दोनों सदनों से किसी भी बिल का पास होना जरुरी होता है। वर्तमान सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि राज्यसभा में उसका बहुमत नही है। ऐसे में अगर हड़बड़ी में कोई काम किया जायेगा तो मुंह की खानी पड़ेगी। यह सत्य है कि आज पूरा देश 35 A को ख़तम करने के इंतज़ार में हैं। देश के लोग शायद सोच भी रहें होंगे कि तीन तलाक बिल को बाद में उठाते, पहले 35 A को संसद के दोनों सदनों से पास कराते तो ज्यादा अच्छा होता। लोगों का सोचना अपनी जगह जायज हो सकता है। लेकिन लोग और सरकार की सोच में फर्क होता है। रही बात 35 A की तो वो मामला बेहद ही संवेदनशील है। लगभग 65 साल से एक नासूर की तरह हमें परेशान कर रहा है। एक कहावत शायद सबने सुनी होगी कि जितनी बड़ी बीमारी उतना ही बड़ा खर्च और उसे ठीक करने के लिए उतना ही ज्यादा समय चाहिए। वर्तमान सरकार 35 A को लेकर कोई भी कदम हलके में नहीं उठाएगी। क्योंकि उन्हें पता है कि एक बार में इस मामले को संसद के दोनों सदनों से अगर पास नहीं कराया गया तो मुश्किल हालात पैदा हो जायेंगें। इसलिए भाजपा नेत्रित्व वाली एन डी ए की सरकार ने लिटमस टेस्ट के रूप में पहली बाजी तीन तलाक पर खेली, जिसमे उसे सफलता मिल गई। राज्यसभा में संख्या कम होने के बावजूद तीन तलाक बिल को बड़ी आसानी से पास करा लिया गया। इस बिल के पारित हो जाने के बाद निश्चित रूप से सरकार का भी मनोबल बढ़ा होगा। उनको  यह अहसास ही नहीं बल्कि पूरा भरोसा हो गया होगा कि अब वो किसी भी सार्थक और देश के लिए फायदेमंद बिल को संसद के दोनों सदनों से पास करा लेंगे। देश की जनता को सरकार की इस पॉलिसी को थोड़ा समझना पड़ेगा। लोगों को यह कहना बंद करना होगा कि सरकार तीन तलाक को लेकर इतनी हड़बड़ी में क्यों थी ?

35 A निश्चित रूप से एक ऐसा अनुच्छेद है जो किसी कलंक से कम नहीं है। हमारे ही देश में एक राज्य जम्मू कश्मीर ऐसा है जहाँ हमारे ही देश का कोई व्यक्ति जाकर स्थाई तौर पर रह नहीं सकता। वहां कोई जमीन जायदाद नहीं खरीद सकता। सुनकर अजीब लगता है। क्यों कि 35 A के अनुसार वहां ऐसा नियम है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति वहां जमीन या जायदाद खरीद ही नहीं सकता। वर्षों से इस अनुच्छेद को हटाने की मांग हो रही है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट में एक एन जी ओ ने याचिक दायर कर इस अनुच्छेद को भारत की भावना के खिलाफ और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला प्रावधान बताया था। उस याचिका के जरिये 35 A और 370 की वैधानिकता को चुनौती दी गई थी। तबसे सुप्रीम कोर्ट में यह मामला चल रहा है। हालांकि अभी इस पर फैसला नहीं आया है लेकिन आज देश में यह सबसे ज्वलंत मुद्दा है।

अब शायद लोगों को समझ में आ गया होगा कि 35 A के बदले सरकार ने सबसे पहले तीन तलाक बिल को क्यों पास करवाया। हालांकि तीन तलाक बिल को पास करना भी सरकार के महत्वपूर्ण एजेंडे में शामिल था। लेकिन तीन तलाक बिल 35 A से ज्यादा संवेदनशील नहीं था। किसी वजह से तीन तलाक बिल अगर राज्यसभा से पास नहीं होता तो बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसके पहले अगर 35 A पर यह टेस्टिंग होती तो निश्चित तौर पर देश के करोड़ों लोगों की निगाह उस पर टिकी होती। ऐसे में कहीं वह बिल गिर जाता तो देश के करोड़ों लोग अपने आपको गिरा मान लेते। लिहाजा इंतज़ार करने की जरुरत है। साथ ही साथ सरकार पर भरोसा करने की जरुरत है। 35 A को हटाने के लिए बिसात बिछनी शुरू हो गई हैं। एक माहौल बनाने की कोशिश होने लगी है। जम्मू कश्मीर में दस हजार अर्ध सैनिक बलों को भेजना उसी बिसात की एक कड़ी है। जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेता इस बात को समझ भी चुके हैं कि अब विरोध करना शायद उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं होगा। लिहाजा उन्होंने भी चिल्लाना बंद कर दिया है। सरकार की कोशिश है कि जम्मू कश्मीर के लोगों की तरफ से भी इस तरह की कुछ आवाजें उठनी शुरू हो जाएँ तो 35 A को हटाना ज्यादा आसान हो जायेगा। अब यह सत्र तो ख़तम होने की कगार पर है। उम्मीद की जानी चाहिए कि शीतकालीन सत्र में 35 A पर ही चर्चा होगी ।