क्या प्राइवेट बिल मंदिर पर कानून का रूप ले पाएगा

क्या प्राइवेट बिल मंदिर पर कानून का रूप ले पाएगा

अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर मंत्री से सन्तरी तक और संसद से सड़क तक चर्चा हो रही है। लेकिन फिलहाल तो मामला राजनीतिक सरगर्मी का रूप ले चुका है। भाजपा के राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा इस मुद्दे पर संसद में प्राइवेट मेंबर बिल प्रस्तुत करने की बात कह चुके हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जल्दी ही बड़ी घोषणा की बात कही है। उन्होंने अयोध्या में भगवान श्रीराम की तांबे की सबसे ऊंची मूर्ति लगाने की भी घोषणा की है। इन सभी के बीच बाबा रामदेव ने कहा कि यदि न्यायालय के निर्णय में देर हुई तो संसद में जरूर इसका बिल आएगा और आना ही चाहिए।

उधर राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष राम विलास वेदांती ने ऐलान किया है कि अयोध्या में दिसंबर में मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा। दिल्ली में देशभर के संतों ने भी राम सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद की सुनवाई टलने के बाद इस मसले पर राजनीति तेज की हुई है। संघ प्रमुख ने भी पिछले दिनों केंद्र सरकार को राम मंदिर पर अध्यादेश लाने पर भी विचार करने को कहा था। राज्यसभा के मनोनीत सदस्य राकेश सिन्हा की राम मंदिर के लिए प्राइवेट मेंबर बिल संसद में पेश करने का खुलासा करना भले ही अहम हो, लेकिन यह भी तय है कि राकेश सिन्हा की बात हवा हवाई नहीं क्योंकि अगर हम प्राइवेट बिल की बात करें तो हमें प्राइवेट बिल का रिकॉर्ड भी देखना चाहिए।

संसद में अब तक 14 प्राइवेट बिल पारित हुए हैं, लेकिन कानून का रूप एक ही बिल ले पाया है। 1968 में सुप्रीम कोर्ट के अधिकार-क्षेत्र के विस्तार के मद्देनजर एक निजी बिल लोकसभा में पारित किया गया था, जिसने नौ अगस्त, 1970 को कानून का रूप लिया। सांसद आनंद नारायण मुल्लाह ने इस बिल को पेश किया था। 2014 में ट्रांसजेंडर के अधिकारों का बिल ऐसा ही निजी प्रयास था, जिसे तब 45 साल के इतिहास में राज्यसभा ने पहली बार पारित किया था।

राकेश सिन्हा पेशे के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते रहे हैं और संघ के साथ भी जुड़े रहे हैं। वह संघ के नीति प्रतिष्ठान के भी निदेशक रहे हैं, लेकिन राम मंदिर आंदोलन से उनका जुड़ाव सिर्फ पैरोकार के रूप में रहा है। अहम सवाल यह है कि प्राइवेट बिल की बात कहकर राकेश सिन्हा ने एक अहम रास्ता निकाला है। निश्चित रूप से  राकेश सिन्हा को एक जिम्मेदार सांसद माना जाता है जिसके चलते वे हवा में बातें नहीं करते है। दूसरी प्रमुख बात यह है कि  श्री सिन्हा संघ विचारक भी हैं ऐसे में उनकी बात को और गंभीरता से लिया जाता रहा है।

निश्चित तौर पर विपक्षी दल हताशा और निराशा से भरे हुए हैं। जिसके चलते वे राम मंदिर के रास्ते में रोड़ा अटका ना चाहते हैं जबकि संघ, संत समाज और भाजपा श्री राम मंदिर के लिए प्रतिबंध है। हालांकि तीनों के ही रास्ते विचार और सोच अलग-अलग है लेकिन कुल मिलाकर इतना तो तय है कि आगामी कुछ समय में निश्चित रूप से अयोध्या विवाद के मामले में निर्णायक फैसला हो सकता है।