सियासत के सिक्के में कहां राज ठाकरे

सियासत के सिक्के में कहां राज ठाकरे

कहते हैं कि जब समाज किसी के पक्ष में हुंकार भर स्वयं में बदलाव करता है, तो उसे ‘आमूलचूल रूपान्तरण’ कहते हैं। राज ठाकरे जिस महाराष्ट्र को बदलने की समय-समय पर हुंकार भरते हैं, वो लोगों के ह्रदय में कम्पन पैदा करता है। उनकी नवनिर्माण सेना मराठा समाज का कोई व्यापक उत्थान नहीं करती और वह लोगों को स्वेच्छा से नहीं, बल्कि धौंसपट्टी के रास्ते पर चलकर अपनी चौधराहट की सियासी झोंका मारने की हठधर्मिता अवश्य लगती है।

राज ठाकरे किस पर राज करेंगे, ये तो नहीं पता, हां! ये जरूर पता है कि उनकी नेतागिरी ने महाराष्ट्र को भयभीत अवश्य किया है। वे कभी इस मुगालते में थे कि ओछी राजनीति कर वे मराठी जन समूह का जिगरा बन जाएंगे, लेकिन आज राज्य की जनता मराठा राजनीति की ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में महाराष्ट्र को देख रही है। सर्वेसर्वा बनने के सपने देखना हो, तो सर्वप्रिय बनने की तमीज भी होनी चाहिए। ये जन कल्याण के रास्ते पर चलकर ही मुमकिन है, न कि अंगारे से बुझे भाषणों के माध्यम से, क्योंकि छोटे विचार और जहरीली जुबान को लोग अच्छा नहीं मानते।

आप या आप जैसा बनने वाला राजनीति के रास्ते में कांटा तो बो सकता है, लेकिन उसकी फसल साक्षर समाज का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी, बल्कि राजनीति को ही कुंद कर देगी। इसलिए समाज के किसी छोटे हिस्से को ही सही, भयभीत करने से खुद का पतन होते भला कौन देखना चाहेगा? अतएव अपनी सियासत चमकाने का ‘शार्टकट’ तरीका छोड़ने में ही भलाई है!

वैसे भी लोकतंत्र की तेज गर्म हवाओं में समझदारी की बुनावटें नहीं हुआ करतीं। रेशे टूटने का खतरा रहता है। इसलिए जब समझदारी परवान चढ़ रही हो, तो राज सहित उन जैसे बाकी नेताओं को शऊर सीखना हो, तो आम लोगों से भी सीख सकते हैं। मराठी राजनीति में कामयाब होना है, तो आपको अपने कामकाज के तरीके में कोमलता लानी ही होगी। अपनी बात सुनाने से पहले सामने वाले की सुननी ही होगी। इसलिए बचे सियासती कीचड़ को समेत उसे उर्वर बनने के लिए छोड़ दीजिये। इसके लिए बस इच्छाशक्ति चाहिए। तारतम्य वालि रेशे की बुनावटें देखने में भली लगती हैं, लेकिन उस काम में समय अच्छा-खासा लगता है। शुरू तो कीजिए!