बदल रहा गढ़चिरोली का आदिवासी समाज

बदल रहा गढ़चिरोली का आदिवासी समाज

कुख्यात नक्सलियों के रूप में पहचान रखने वाले आदिवासी जनजाति बहुल गढ़चिरोली जिले में शायद ही कोई अवैध काम होंजो न होते हों। यहां नरक की जिंदगी जी रहे आदिवासी समाज की कहानी भी सभी जानते हैं। अवैध शराब का धंधा हो या फिर हत्या की वारदात, यहां के नक्सलियों के लिए ये काम बहुत आसान है। पुलिस और प्रशासनिक अमला भी इनसे खौफ खाता है। अब अवैध शराब की तस्करी और नक्सलियों के खौफ के बीच महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के अरोमोरी तालुके के मानपुरा गांव की पंचायत ने जो फैसला लिया है, उससे वे सांप भी मार रहे हैं और लाठी भी नहीं तोड़ रहे। यहां के आदिवासी न तो नक्सलियों से कुछ कह रहे हैं और न ही पुलिस से मदद मांग रहे हैं। अवैध शराब का कारोबार करने वालों के केवल पोस्टर पूरे गांव में चिपका कर एक अलग तरह की पहलकर रहे हैं।

आदिवासियों की इस कोशिश से यहां बदलाव भी बहुत जल्द महसूस किया जाएगा। वह बदलाव, जो केंद्र और राज्य सरकारों के लाख सुधार कार्यक्रम चलाने के बाद भी नहीं आया है। जिस वैध शराब से महाराष्ट्र सरकार को सालाना 12-13 हजार करोड़ रुपए की आमदनी होती है, उसी शराब को सरकार ने गढ़चिरोली जैसे जिलों में बैन कर दिया। इससे सरकार की कोशिश थी कि नक्सलियों को शराब नहीं मिल सकेगी। लेकिन उस अवैध शराब का क्या, जो यहां के आदिवासी खुद बनाते हैं? महाराष्ट्र के वर्धा, चंद्रपुर के साथ ही गढ़चिरोली में शराब बैन होने के बावजूद यहां न सिर्फ अवैध शराब बनती है, बल्कि गढ़चिरौली से लगे जिलों गोंदिया और भंडारा से सस्ते दामों पर शराब की तस्करी भी बड़े पैमाने पर होती है। यहां के ग्रामीणों के सामने संकट ये था कि वे इन शराब माफियाओं को रोक नहीं सकते थे, क्योंकि इसका मतलब जान से हाथ धोना था।

एक तरह से देखें, तो जो आदिवासी समाज अवैध शराब को कभी खुद बनाता, पीता और बेचता भी था, वक्त के साथ अगर उसके विचार बदले हैं, तो ये सरकार की कोशिशों का नतीजा है। यही वजह है कि अबकी पंचायत का ये फैसला उन पर भी लागू होगा, जो आदिवासी समाज के लोग ही इस अवैध शराब तस्करी में जुड़े हैं। उनके भी पकड़े जाने पर 20 हजार रुपए का जुर्माना और अवैध शराब पीते पकड़े जाने पर भी पांच हजार रुपए का जुर्माना लगाकर पंचायत ने ये संदेश देने की कोशिश की है कि शराब बुरी चीज है। अब सवाल ये कि अगर कोई ये हर्जाना ना दे, तो क्या होगा? वैसे तो आदिवासी समाज के बारे में जो थोड़ी-बहुत भी जानकारी रखता होगा, उसे ये पता होगा कि जुर्माना ना देने पर इस समाज में और कठोर सजा का प्रावधान होता है।...और ये सजा पोस्टर लगाकर सामाजिक दंड के रूप में पाना कोई भी नहीं चाहेगा।

वास्तव में देखें, तो किसी भी बदलाव की शुरुआत भी खुद से ही होती है। जब तक व्यक्ति पूरे मनोयोग से इस बदलाव के लिए प्रयास नहीं करता, बदलाव नहीं आ सकता। इसके लिए सबसे पहले सोच बदलनी पड़ती है। जब व्यक्ति की सोच बदल जाती है, तो उसका आचार-व्यवहार भी बदलने लगता है। यही बदलाव की कोशिश अब अगर गढ़चिरोली में शुरू हुई हैतो काफी हद तक संभव है कि नई पीढ़ी इस बुराई से दूर रहे और आदिवासी समाज बदलाव की ओर मुड़ सके।