शिक्षकों से मर्यादित व्यवहार की अपील

शिक्षकों से मर्यादित व्यवहार की अपील
शिक्षकों से मर्यादित व्यवहार की अपील

अंधकार से प्रकाश की ओर जाने वाले शिक्षक की हमारी भारतीय संस्कृति में परमब्रह्म के समान मान्यता हैं। शिक्षक अपने ज्ञान के दीप से शिष्य की अज्ञानता की काली छाया को दूर करता है। शिक्षक के पदचिन्हों पर चलना हर शिष्य कर्तव्य है। अगर यही शिक्षक सरकार से अपनी मांग मनवाने के लिए अराजकता पर उतर जाएं, तो फिर इनके पदचिन्हों पर कौन चलेगा।

झारखंड में बिरसा मुंडा जयंती और राज्य स्थापना दिवस पर पारा शिक्षकों की ओर से की गई पत्थरबाजी को लेकर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने शिक्षकों को जो नसीहत दी, कम से कम उससे ऐसे शिक्षकों को शर्म से पानीपानी हो जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने सही कहा कि पत्थर मारने वाला शिक्षक नहीं हो सकता। यह सही है कि विरोध के अनेक तरीके हैं। हर राज्यों में शिक्षक अपनी मांग मनवाने के लिए आंदोलन करते हैं, कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। इसके विपरीत अगर अपनी मांग के लिए कोई पत्थरबाजी करे, किसी को हिंसा से आहत करने की कोशिश करे, तो मुख्यमंत्री का नाराज होना तो बनता ही है। सीएम का यह भी कहना ठीक है कि आप साल भर काले झंडे दिखाओ, मुझे आपत्ति नहीं, लेकिन गुंडागर्दी शिक्षक का स्वभाव नहीं है। शिक्षकों की इस करतूत से उन्हें फायदे की जगह नुकसान होता ही दिख रहा है। अगर इन शिक्षकों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग रखी होती, तो संभव था कि उनकी मांगों पर मुख्यमंत्री विचार करते। समस्या का समाधान होता, लेकिन हठधर्मिता से मुख्यमंत्री को दबाव में लेने की कोशिश में पत्थरबाजी कर अपनी मांग मनवाना भला कैसे उचित कहा जा सकता है। हर समस्या का समाधान है, लेकिन एक निश्चित प्रक्रिया के तहत। अगर शिक्षक ही इसे नहीं समझेंगे, तो उनके शिक्षा लेने वाले छात्र भविष्य में कैसे एक अच्छे नागरिक बन सकेंगे।

झारखंड के पारा शिक्षकों को मुख्यमंत्री की इस नसीहत को गंभीरता से लेने की जरूरत है। अपनी मांग मनवाने के लिए अब उन्हें नए सिरे से विचार करना होगा। कम से कम अब जो करतूत उनकी ओर से की गई है, उससे तो ऐसा नहीं लगता कि उनकी बातों पर गुस्साए मुख्यमंत्री तत्काल अमल कर ही लेंगे। अब तो उन्हें उनके गुस्से के ठंडा पड़ने का इंतजार भी करना होगा। यह जरूर है कि मुख्यमंत्री इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए उनकी समस्याओं का समाधान करने की दिशा में आगे बढ़ें, लेकिन मुख्यमंत्री की यह नसीहत पारा शिक्षकों को भविष्य में याद रखने की जरूरत है। ये उनके जीवन में आगे भी काम आएगी।