माल हड़पने के लिए फर्जी रजिस्ट्रेशन

माल हड़पने के लिए फर्जी रजिस्ट्रेशन
माल हड़पने के लिए फर्जी रजिस्ट्रेशन

आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना के मूल में यह सपना निहित था कि इससे देश के कुपोषित बच्चों को पोषण मिलेगा। सामाजिक सरोकार रखने वाले इस विभाग में कभी किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि गरीब, बेसहारा, कुपोषित बच्चों के लिए जीवनदाता बनने वाले ये केंद्र वास्तव में भ्रष्टाचार के अड्डे बन जाएंगे। अब तक ये खबरें सामने आती थीं कि बच्चों के लिए गया पुष्टाहार पशुओं को खिला दिया गया या फिर बाजार में बेच दिया गया। पर अब एक नया खुलासा हुआ है। दिल्ली में हुई राष्ट्रीय पोषण परिषद की बैठक में जो सामने आया है, उसमें बताया गया कि देश में 14 लाख से ज्यादा बच्चों का पंजीकरण ही फर्जी है। यानी बच्चों के नाम पर माल हड़पने का नया तरीका। असली पुष्टाहार हड़पने के लिए नकली बच्चे कागजों में पैदा कर दिए गए।

  केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से ये डेटा साझा होने के बाद आंगनबाड़ी केंद्रों को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हैं। अब तो लोग इसके अस्तित्व पर ही सवाल उठा रहे हैं। कहा जा रहा है कि फर्जी बच्चों की पहचान के बाद अब हर महीने तकरीब 35 करोड़ रुपए सरकार बचा सकेगी। यह सही है कि शासन की मंशा से संचालित कोई भी योजना गलत नहीं होती, बशर्ते वह भ्रष्टाचार से बची रहे। शायद आंगनबाड़ी के साथ ऐसा नहीं हो पा रहा है।

 हालिया घोटाला भी तब हुआ है, जब यह दावा किया जाता रहा है कि केंद्रों का नियमित वेरिफिकेशन होता रहा है। इन केंद्रों पर छह साल तक की उम्र के अल्पपोषित या कुपोषित बच्चों को पोषाहार दिया जाता है, लेकिन इन बच्चों को कितना अपना हक मिलता है, यह बात अब आइने की तरह साफ है। असली झोल बच्चों के पंजीकरण में ही है। कई जगहों पर एक बार पंजीकरण के बाद वही बच्चे दूसरी जगहों पर भी पंजीकृत हो जाते हैं। उनके हिस्से का दोगुना पुष्टाहार शासन से आवंटित हो जाता है। अमूमन बच्चे एक जगह से पुष्टाहार लेते हैं या फिर कहीं से नहीं लेते। यहीं से फर्जीवाड़ा शुरू होता है। अक्सर केंद्र संचालिका उसे बाजार में बेच देती है। इससे शासन की असली मंशा धरी की धरी रह जाती है और इस मद में शासन से आए धन का बंदरबांट हो जाता है। केंद्रों को भी यह बात समझनी होगी कि सरकार ने उन पर जो जिम्मेदारी सौंपी है, वह गरीब, मजलूमों के हित में है। ये किसी के जीवन से जुड़ा सवाल है और कम से कम गरीबों के हक पर डाका डालना इंसानियत के नजरिए से भी ठीक नहीं है।