आधार कम, चाहत ज्यादा

आधार कम, चाहत ज्यादा
आधार कम, चाहत ज्यादा

पिछले कुछ महीनों से बिहार में गठबंधन को लेकर सुगबुगाहट चल रही है। इसमें जदयू, भाजपा और लोक जनशक्ति पार्टी के बीच सीटों को लेकर शुरुआती बात हुई और तय हुआ कि 16-16 सीटों पर भाजपा और जदयू लड़ेंगे, जबकि पांच सीटों पर पासवान की पार्टी लोक जन शक्ति पार्टी लड़ेगी। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को दो सीटें दी जाएंगी। एक सीट कुशवाहा की पार्टी के बागी सांसद अरुण कुमार को दी जाएगी।

सभी दलों को ये समझौता एक तरह से स्वीकार था, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा को नहीं। पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को तीन सीटें मिली थीं। इस बार वे उससे ज्यादा सीटें चाहते थे। जबकि हालात पिछली बार से बिल्कुल उलट थे। तब जदयू भाजपा के साथ नहीं थी और अब जदयू भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में उसे समायोजित करना ज्यादा जरूरी है। चूंकि जद यू को एकमुश्त 16 सीटें दी जा रही थीं, इसलिए सभी की सीटें कम होनी थीं। बीजेपी की भी कम हुईं और पासवान की भी। कुशवाहा की भी कम की गईं। पर कुशवाहा इस स्थिति को समझने को तैयार नहीं थे। नतीजा ये निकला कि उनकी गैर तार्किक बात को धीरे-धीरे सुनना बंद कर दिया गया और आपस में तय हुआ कि वे अगर अलग होते हैं तो बीजेपी जदयू 17-17 सीटों पर लड़ेंगी और पासवान को छह सीटें दी जाएंगी। अरुण कुमार भाजपा के टिकट पर लड़ेंगे। इसका एक ये भी मतलब है कि भाजपा और जदयू ने इस बात को समझ लिया है कि उपेंद्र कुशवाहा के मिलने से हमें फायदा बहुत कम है, जबकि शेयर उन्हें उनकी ताकत की तुलना में ज्यादा देना पड़ेगा।

अब उपेंद्र कुशवाहा इस दौर से उस दौर जा रहे हैं, पर कोई उनकी सुनवाई नहीं कर रहा। विपक्षी नेताओं तेजस्वी यादव और शरद यादव से भी मिल चुके, पर कहीं दाल नहीं गली। फिर भी स्थिति को समझने और सुधरने की बजाय वे भाजपा को धमका रहे हैं कि अगर एनडीए नहीं संभला तो उसे काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। अरे कुशवाहा जी, एनडीए तो समझ चुका है कि आप को ढोना ज्यादा है, आपसे मिलना कम है। बस आप नहीं समझ रहे। एनडीए आपको साथ रखना तो चाहता है, पर वह आपका कितना बोझ उठाए।

बिहार में अगर कुशवाहा हैं तो उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर हैं। पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा के साथ मिलकर लड़े और जीतकर आज मंत्री बन गए हैं। मंत्री बनते ही उनमें अहंकार आ गया। उन्हें लगा कि वे भाजपा को अपनी उंगली पर नचा सकते हैं। आए दिन अनाप-शनाप बयान देते हैं। पर भाजपा उन्हें फिर भी सिर आंखों पर बिठाए हुए है। कोई और होता तो कब का निकाल बाहर करता। पर राजभर जी ये समझने को तैयार नहीं हैं। वे ये भी भूल जा रहे हैं कि अलग से लड़ेंगे तो शायद विधायक भी न बन पाएं। पर समझाए कौन।

बिहार में उपेंद्र कुशवाहा और उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर की स्थिति एक जैसी है। इन्हें लगता है कि इन्हीं के चलते इनके राज्यों में बीजेपी की जीत हुई है और ये नहीं रहेंगे तो बीजेपी की करारी हार होगी। जबकि सचाई ये है कि ये दोनों ही अब भाजपा के लिए बोझ बन गए हैं।