इकलौते विधायक ने भी छोड़ा साथ

इकलौते विधायक ने भी छोड़ा साथ

साल 2006 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन करने वाले राज ठाकरे कभी शिवसेना को ही खा जाने का दंभ भरते थे। एक वक्त वो भी आया, जब 2009 के विधानसभा चुनाव में मनसे ने 13 सीटें जीतीं। इस पर वे महाराष्ट्र की राजनीति में कभी किंग मेकर’, तो कभी एंग्री यंग मैनतक कहे गए। अब उसी राज ठाकरे की पार्टी मनसे की स्थिति ये है कि पूरे महाराष्ट्र में उनकी पार्टी के इकलौते बचे विधायक ने भी उन्हें छोड़कर शिवसेना से नाता जोड़ लिया है। मनसे छोड़कर शिवसेना में जाने वाले पुणे जिले के जुन्नार विधायक शरद सोनवाने वही हैं, जिन्होंने कभी शिवसेना की आशा ताई को लगभग 17 हजार मतों से हराया था। उनका साथ छोड़ना राज ठाकरे के लिए किसी गंभीर झटके से कम नहीं है। खासकर उस राज ठाकरे के लिए, जिनकी महाराष्ट्र की राजनीति में लोकप्रियता का आलम ये था कि चुनावों से पूर्व राज्य के भावी मुख्यमंत्री के सवाल पर हुए 2009 के एक सर्वे में पृथ्वीराज चव्हाण और उद्धव ठाकरे के बाद राज सबकी पसंद थे।

राज ठाकरे को भी शायद इसका अंदाजा नहीं होगा कि उन्हें ऐसे दुर्दिन भी देखने पड़ेंगे, जब वे राजनीति में बिल्कुल अकेले पड़ जाएंगे। राज ठाकरे शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के भतीजे हैं और वर्तमान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई हैं। राज अपने चाचा बाल ठाकरे की तरह काफी तेज और भड़काऊ भाषणों के लिए भी जाने जाते हैं। शिवसेना से सियासी सफर शुरू करने वाले राज ठाकरे को कभी शिवसेना के बतौर भावी नेता भी देखा जाता था। हालांकि शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे का अपने बेटे उद्धव ठाकरे की ओर झुकाव से नाराज राज ठाकरे ने 2006 में अपनी नई पार्टी मनसे बनाई थी। चूंकि वे शिवसेना से अलग होकर राजनीति करने उतरे थे, तो तब उनका यहां तक दावा था कि वे शिवसेना को महाराष्ट्र से साफ़ कर देंगे। उनकी सक्रियता ही थी कि 2009 के विधानसभा चुनाव में मनसे ने मुंबई, पुणे, नासिक जैसे अपने पुराने प्रभाव क्षेत्रों में शिवसेना-भाजपा गठबंधन को 288 सीटों में से तीन दर्जन से ज्यादा सीटों पर नुकसान पहुंचाकर उसे सत्ता में आने से रोक दिया था।

मनसे तब भी सुर्खियों में आया था, जब उसके कार्यकर्ताओं ने उत्तर भारतीयों पर राजनीतिक और शारीरिक तौर पर हमले किए थे। पर पिछले कुछ बरसों में महाराष्ट्र की राजनीति में मनसे की राजनीति में तेजी से गिरावट आई है। यहां तक कि 2017 में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में चुने गए मनसे के सात पार्षद भी राज ठाकरे का साथ छोड़कर शिवसेना में जा चुके हैं। राजनीतिक वजूद बचाने के लिए राज ठाकरे इन दिनों खूब हाथ-पांव मार रहे हैं, पर हर बार निराशा ही मिल रही है। बीते दो माह में राज ठाकरे एनसीपी मुखिया शरद पवार और उनके भांजे अजित पवार से गठबंधन करने के लिए भी मिल चुके हैं। जो राज ठाकरे कभी अपनी शर्तो पर राजनीति करते हुए पहले मुंबई नॉर्थ-ईस्ट सीट से लड़ने का दबाव बना रहे थे, अब वे कल्याण सीट से भी समझौता को तैयार हैं। इस सीट पर भी फैसला होना बाकी है, क्योंकि कांग्रेस गठबंधन में राज ठाकरे को प्रवेश देने का विरोध कर रही है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या आगामी चुनावों में राज ठाकरे अकेले ही बने रहते हैं या फिर इस बुरे दौर से बाहर निकलने का उन्हें मौका मिलता है।