छोटी पार्टियां भी कांग्रेस-एनसीपी से नाराज

छोटी पार्टियां भी कांग्रेस-एनसीपी से नाराज

अब तक देश की राजनीति में होता ये रहा है कि टिकट न मिलने से नाराज होकर टिकट के दावेदार बागी सुर अपनाते थे। कभी वे निर्दल चुनाव लड़ते थे, तो कभी किसी अन्य दल के टिकट पर मैदान में उतर जाते थे। अबकी महाराष्ट्र में स्थिति इससे अलग है। अबकी टिकट का बंटवारा तो दूर, बन रहे गठबंधन में सीटों को लेकर ही बागी सुर सामने आने लगे हैं। यहां कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को ही लें, तो दोनों दलों ने साथ चुनाव में उतरने का फैसला करते हुए समझौते के तहत 48 में से 45 सीटें आपस में ही बांट ली है। सिर्फ बाकी बची तीन सीटों को अपने साथ आने वाली पार्टियों जैसे राजू शेट्टी की स्वाभिमानी पार्टी’, प्रकाश आंबेडकर की भारिप बहुजन महासंघ’ (बीबीएम) और एक अन्य सहयोगी लोकतांत्रिक जनता दलको दी। अब पेंच यही फंसा है और सीटों का सही तालमेल न होने का आरोप लगाते हुए ये छोटी पार्टियां बिदकती दिख रही हैं। यही वजह है कि अबकी इन दलों से टिकट बंटवारे से पहले ही बागी सुर उठने लगे हैं।

लोकतांत्रिक जनता दल के प्रदेशाध्यक्ष व एमएलसी कपिल पाटिल ने तो मित्र दलों को सिर्फ तीन सीट दिए जाने पर नाराजगी जताते हुए कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक चव्हाण और एनसीपी नेता अजित पवार को पत्र लिखकर भी नाराजगी जता दी है। उन्होंने सवाल उठाया है कि यदि मित्र दलों को सिर्फ तीन सीटें देने का मन बनाया गया है, तो यह समझौता क्यों? इस तरह से उन्होंने इस समझौते को नकार कर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे इस गठबंधन से अलग होकर चुनाव मैदान में आ सकते हैं। एक तरह से जब लोकसभा चुनावों से पहले महाराष्ट्र में कांग्रेस पूरी ताकत से फिर एक बार खड़ी होने का प्रयास कर रही है और एनसीपी को मिलाकर महागठबंधन का खाका भी तैयार कर चुकी है, उसी दौर में छोटी पार्टियों की ये नाराजगी झेल कर आगामी चुनाव कितनी दमदारी से लड़ पाएगी, ये आसानी से समझा जा सकता है।

हालांकि कांग्रेस में ये बगावत के सुर केवल छोटी पार्टियों से ही नहीं उठे हैं, बल्कि खुद कांग्रेस में भी बगावत की स्थिति है। कांग्रेस के बड़े नेता और विधानसभा में नेता विपक्ष राधेकृष्ण विखे पाटिल के बेटे डॉ.सुजॉय विखे पाटिल ने भी बगावत का सुर अपनाया है। कांग्रेस के बड़े नेता और विधानसभा में नेता विपक्ष राधेकृष्ण विखे पाटिल के बेटे डॉ.सुजॉय विखे पाटिल पार्टी विरोधी बयान देकर अपनी नाराजगी को जगजाहिर कर दिया है। डॉ.सुजॉय विखे पाटिल ने कहा है कि जरूरी नहीं कि माता-पिता जिस पार्टी की सेवा कर रहे हैं, वे भी उसी पार्टी के लिए काम करें। उनका अपना भी मत है और वे अपने विचारधारा के अनुसार अपनी पार्टी चुन सकते हैं। यह सही है कि जरूरी नहीं कि जिस पार्टी विशेष में पिता की आस्था हो, बेटा भी उसी में अपनी आस्था जताए। हो सकता है कि उसकी विचारधारा किसी विरोधी पार्टी से भी मेल खाती हो। उसकी नीतियां उसे रास आती हो या फिर उसी दल में वे अपना करियर उज्जवल देखता हो।

हालांकि इस पूरे विवाद में महाराष्ट्र कांग्रेस के घर में कलह होने की बात को उजागर कर दिया है। फिलहाल सुजॉय के इस बयान के बाद चर्चा का बाजार गर्म है कि वे कांग्रेस छोड़ किसी अन्य पार्टी का दामन थाम सकते हैं। असल में उनकी नाराजगी की वजह है अहमदनगर सीट का एनसीपी के खाते में जाना। यह विखे पाटिल का गढ़ माना जाता है। वे यहीं से विधायक हैं और उनकी पत्नी कांग्रेस की जिला परिषद अध्यक्ष। सुजॉय अपने लिए लोकसभा सीट की मांग कर रहे थे, लेकिन महागठबंधन के सीट बंटवारे में ये एनसीपी के खाते में जा रही है। कांग्रेस भी इससे परिचित है कि अगर अहमदनगर में विखे पाटिल या उनका परिवार नाराज होता है, तो यह सीट खतरे में पड़ सकती है। इसलिए सुजॉय को मनाने का प्रयास भी कांग्रेस की ओर से जारी है, लेकिन बात बनती नहीं दिख रही है। वैसे न सिर्फ महागठबंधन बल्कि महाराष्ट्र में तो यह स्थिति तकरीबन हर दल में बनती दिख रही है। भाजपा-शिवसेना की भी बात करें, तो यहां एक ओर जहां भाजपा की कोशिश है कि शिवसेना को साथ लेकर चुनाव लड़े, तो दूसरी ओर शिवसेना है कि भाजपा से अलग होकर ही चुनाव लड़ने के लिए मचल रही है। हालांकि देर-सबेर यहां बात बनने की उम्मीद इसलिए की जा सकती है, क्योंकि शिवसेना का केंद्र में समर्थन जारी है और उम्मीद की जा सकती है कि यहां बात बन जाए। इसके विपरीत कांग्रेस में छोटे दलों की नाराजगी भारी पड़ने की बात तय मानी जा रही है।