अब सिंघवी तय करेंगे कौन लड़ेगा चुनाव

अब सिंघवी तय करेंगे कौन लड़ेगा चुनाव
अब सिंघवी तय करेंगे कौन लड़ेगा चुनाव

वरिष्ठ वकील और कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी अब तय करेंगे कि किसे राजनीति करनी चाहिए और किसे नही करनी चाहिए। एक बयान में सिंघवी ने यह कहकर बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर दिया है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी को राजनीति नहीं करनी चाहिए क्योंकि वो योगी हैं। अब भी विदेशी मानसिकता की सोच रखने वाले अभिषेक के इस बयान के बाद कांग्रेस के किसी नेता का बयान तो नही आया है लेकिन भाजपा ने जरूर ये कह दिया है कि सिंघवी कुछ बोलने से पहले देश की चुनावी प्रक्रिया को जरूर पढ़ लें।

आदित्य नाथ योगी पिछले 20 वर्षों से राजनीति में हैं। वो गोरखपुर से पांच बार सांसद रह चुके हैं। पिछले नौ महीने से उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री हैं। इतने वर्षों में उनकी राजनीति पर किसी ने भी आवाज नही उठाई। अब अचानक अभिषेक मनु सिंघवी ने क्या सोचकर ऐसा बयान दे दिया जिसे सुनकर भाजपा के साथ साथ हो सकता है उनकी पार्टी भी हैरान हो। संविधान में कहीं जिक्र नही है कि साधु, महात्मा या कोई योगी चुनाव नही लड़ सकता। यहां तक कि किन्नरों के चुनाव लड़ने पर भी रोक नही है। अभिषेक मनु सिंघवी शायद भूल गए होंगे कि उसी गोरखपुर की जनता ने आशा देवी किन्नर को जीता कर वहां का मेयर बनाया था।

योगी का राजनीति करना अगर गलत होता तो बीस साल पहले ही उन पर चुनाव आयोग का डंडा चल गया होता। जब वो 1998 में गोरखपुर से पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े थे। अभिषेक मनु सिंघवी पेशे से वकील हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। उनकी अधिकांश पढ़ाई विदेशों में हुई है। उनके पिता भी ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे। वो अलग बात है कि कम उम्र होने के बावजूद भी वो सुप्रीमकोर्ट के सीनियर वकील बन गए थे। सुप्रीमकोर्ट में भी उन्होंने ऐसा काम कर दिया था जिसे देश की जनता आज तक नहीं भूली है। अपने चैंबर में ही एक महिला को उन्होंने जज बनाने का झांसा देकर कुछ गड़बड़ किया था जिसकी सीडी वाइरल हो गई थी। पूरे देश ने उस सीडी को देखा था।हालांकि उन्होंने अपने प्रभाव से उस सीडी के प्रसारण पर रोक लगवाने में सुप्रीम कोर्ट से सफलता पा ली थी।

योगी को राजनीति करने की बात कोई आम आदमी कहता तो शायद इतना बखेड़ा खड़ा नही होता। लेकिन अभिषेक मनु सिंघवी के बयान के बाद बवाल इसलिए मचा है क्योंकि वो कानून के जानकार हैं। देश के वरिष्ठ वकील हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो देश की चुनाव प्रक्रिया को बेहतर समझते होंगे। लेकिन उन्होंने अपने बयान से यह साबित कर दिया कि वो सिर्फ चारित्रिक रूप से बहूत कमजोर हैं बल्कि कानूनी रूप से भी अस्थिर हैं।

सीडी मामले के बाद से ही कांग्रेस ने उन्हें प्रवक्ता के पद से मुक्त कर रखा है। ऐसे में एक और बचकाना बयान देकर सिंघवी ने रही सही राजनीत पर भी प्रसन्न चिन्ह लगवा लिया। अब कांग्रेस उन्हें फिर से पार्टी की मुख्यधारा में लाने के लिए सौ बार सोचेगी और अगर कांग्रेस इस बयान का पुरजोर खंडन नही करती है तो यह मान लेना चाहिए कि उनका बयान कहीं कहीं कांग्रेस के कहने पर ही दिया गया है।