परमहंस दास को चुनावों के ठीक पहले ही क्यों याद आया मंदिर का मुद्दा?

परमहंस दास को चुनावों के ठीक पहले ही क्यों याद आया मंदिर का मुद्दा?

अयोध्या से आज खबर आयी कि राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर आमरण-अनशन पर बैठे तपस्वी छावनी के महंत स्वामी परमहंस दास को पुलिस ने जबरदस्ती हटा दिया और उनका अनशन खत्म हो गया। कहा यह जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से मंत्री सतीश महाना स्वामी परमहंस से मिलने पहुंचे थे और परमहंस दास से अनशन खत्म करने की गुजारिश की थी जिसे नहीं मानने के बाद पुलिस हरकत में आई और स्वामी परमहंस को जबरदस्ती अनशन स्थल से हटा दिया।

पर प्रशासन का कहना है कि 7वें दिन स्वामी परमहंस दास का स्वास्थ्य खराब हो रहा था, इस वजह से स्वामी परमहंस दास को इलाज के लिए लखनऊ हायर सेंटर पीजीआई भेजा गया। इस दावे-प्रतिदावे के बाद अनशन स्थल पर नाराज समर्थकों का भारी विरोध भी शुरू हो गया।

मंदिर मुद्दे को लेकर परमहंस दास जो बात कर रहे हैं, उसका समर्थन करते हुए विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नेता प्रवीण तोगड़िया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पर अयोध्या में राम मंदिर बनाने के वादे को पूरा नहीं करने के आरोप लगाए।

परमहंस दास कहते हैं कि जब एससी/एसटी कानून की बात आती है तो मोदी कहते हैं कि मामले पर संसद निर्णय लेगी, न कि अदालतें। लेकिन जब राम मंदिर बनाने की बात आती है तो मोदी पीछे हट जाते हैं और कहते हैं कि इस मुद्दे पर अदालतें निर्णय करेंगी न कि संसद। दोनों ही अध्यादेश लाकर मंदिर बनाने की मांग कर रहे हैं।

स्वामी परमहंस दास को जिस तरह से हटाया गया और उसको लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि चुनावों के ठीक पहले ही इनको मंदिर की याद क्यों आती है? ये साढ़े चार साल तक क्या करते रहे? इसके पहले अनशन पर क्यों नहीं बैठे?

वर्तमान हालातों में तो यही लगता है दूसरों की कौन कहे, स्वामी परमहंस दास भी मंदिर निर्माण को लेकर बहुत गंभीरर नहीं रहे हैं और वे भी राजनीति ही कर रहे हैं। स्वामी परमहंस दास जैसे कई अन्य स्वामी और नेता भी कुछ ऐसा ही करते दिख रहे हैं। मंदिर की किसी को चिंता नहीं, सब राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। मंदिर कानून और संविधान के अनुसार ही बनेगा, लेकिन देश के संत इस मामले में मार्गदर्शक का कार्य तो कर ही सकते हैं जो वे करते हुए नहीं दिख नहीं रहे हैं।