मनसे नहीं लड़ेगी चुनाव

मनसे नहीं लड़ेगी चुनाव

आपको महाभारत का बर्बरीक याद होगा जब उसने ये प्रण लिया था कि वह पांडव और कौरवों में जो कमजोर पड़ेगा, उसकी ओर से युद्ध लडेगा। तब महाबली भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक के गले को कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से काटकर उसे अमृत से सींच दिया। तय हुआ कि यहीं से वो पूरा महाभारत देखेगा। अब कुछ ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) मुखिया राज ठाकरे की भी हो गई है। जो राज ठाकरे लोकसभा चुनाव-2019 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद होने की तैयारी कर रहे थे, अब उसी राज ठाकरे को बर्बरीक की तरह 2019 का लोकसभा चुनाव सिर्फ देखेंगे, लड़ेंगे नहीं। चर्चा ये भी है कि उनकी पार्टी महाराष्ट्र में शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को बाहर से समर्थन देने पर विचार करेगी। इस पर भी अभी फैसला नहीं हुआ है। अब सवाल ये उठता है कि जो राज ठाकरे कभी खुद को मोदी सरकार के खिलाफ एक दमदार नेता मानते थे, आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उनको लोकसभा के रण से पलायन करना पड़ा?

मौजूदा महाराष्ट्र की राजनीति को थोड़ा-बहुत भी समझने वाला कोई भी आसानी से अंदाज लगा सकता है कि वर्तमान में मनसे बेहद ही निराशाजनक दौर में है। मनसे का चुनावी प्रदर्शन पिछले कुछ चुनावों से प्रभावशाली नहीं रहा है। मनसे की स्थापना 2006 में राज ठाकरे ने शिवसेना के संरक्षक और अपने चाचा बाल ठाकरे से अलग होकर की थी। 2009 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुल 288 सीटों में से 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी नौ उम्मीदवार उतारे, पर एक भी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर पाई थी। इसके बाद के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी मनसे 250 सीटों में से केवल एक सीट जीतने में सफल रही। वह भी पिछले दिनों तब हाथ से निकल गई, जब पुणे जिले में जुन्नार विधानसभा क्षेत्र से उनकी पार्टी के एकमात्र विधायक शरद सोनवाने भी शिवसेना में शामिल हो गए।

अब अगर राज ठाकरे लोकसभा चुनाव-2019 से दूर हो रहे है, तो नि:संदेह ये उनका दिनोंदिन महाराष्ट्र में घटता जनाधार ही है। भले ही इस वजह को छिपाने के लिए राज ठाकरे ने कहा है कि पूरा महाराष्ट्र उनका निर्वाचन क्षेत्र है। वे किसी एक निर्वाचन क्षेत्र तक खुद को सीमित नहीं रखना चाहते। ये हास्यास्पद बहाना भर है। हालांकि कुछ लोग ये भी कह सकते हैं कि वे मनसे को केवल राज्य तक सीमित रखना चाहते हैं। ये ठीक है, पर कोई भी राजनेता अपनी पार्टी को विस्तार देना चाहता है। कम से कम चुनाव लड़ते तो उनके कितने समर्थक हैं, इसका पता चलता। ये भी पता चलता कि वे क्यों नाराज हैं। हो सकता था कि तब विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में मदद मिलती। अब जब लड़ेंगे ही नहीं, तो इसका अंदाजा कैसे लगेगा। अब तो सिर्फ वो बाहर से ही सबको लड़ते भर ही देखेंगे।