कमलनाथ की कमजोर सरकार को धमकाकर अपना आधार बढ़ाने में जुटीं

कमलनाथ की कमजोर सरकार को धमकाकर अपना आधार बढ़ाने में जुटीं

बसपा सुप्रीमो मायावती राजनीतिक तौर पर बहुत चतुर खिलाड़ी हैं। वे स्थितियों को अपने पक्ष में करने में माहिर हैं। कब किसका कैसे इस्तेमाल किया जाए, वे बखूबी जानती हैं। इसीलिए उन्होंने समय-समय पर सबका इस्तेमाल किया, जबकि कोई दूसरा दल उनका इस्तेमाल कभी भी नहीं कर पाया। उन्होंने मुलायम सिंह यादव और भारतीय जनता पार्टी दोनों के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई और चलाई। लेकिन जब उन लोगों को सत्ता सौंपने की बात आई तो किनारा कर लिया। इसी तरह अब मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की कमजोर सरकारों का इस्तेमाल करने की योजना बना रही हैं। दोनों जगहों पर कांग्रेस की अल्पमत की सरकारें हैं। पहले तो उन्होंने एलान किया कि वे बिना शर्त कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे रही हैं, लेकिन अभी महीना भर भी नहीं बीता कि वे धमकी पर उतर आई हैं। उन्होंने धमकी दी कि आंदोलन के दौरान बसपा कार्यकर्ताओं पर दायर मुकदमे वापस न लिए गए तो वह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेंगी। उनकी धमकी का असर भी दिखा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एससी, एसटी समुदाय पर से मुकदमे वापस लेने का फैसला किया है। ये मुकदमे करीब छह महीने पहले दायर किए गए थे। तब वहां भाजपा की मजबूत सरकार थी। तब मायावती ने इस तरह की कोई मांग नहीं उठाई, क्योंकि वो जानती थी कि भाजपा इस तरह की उनकी किसी भी ब्लैक मेलिंग के सामने नहीं झुकेगी। पर कमजोर सरकार को झुकाना आसान है। बहरहाल अभी तो ये शुरुआत है, देखिए कांग्रेस की कमजोर सरकार किस हद तक झुकती है।

दो अप्रैल 2018 को दलित और आदिवासी समाज ने एससी-एसटी कानून 1989 व सरकारी कर्मचारियों की प्रोन्नति में आरक्षण की पूर्ण बहाली की मांग को लेकर बसपा ने आंदोलन किया था। इसमें मायावती का आरोप है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत भाजपा शासित राज्यों में जातीय व राजनीतिक द्वेषवश निर्दोषों को फंसाया गया। अब जब कमलनाथ सरकार ये केस वापस लेने जा रही है, तो इससे एक बार फिर मायावती ने अपने कैडरों को ये संदेश देने में सफलता पाई है कि वे भले ही किसी भी दल के साथ रहे, सरकार बनाने में समर्थन दे या कोई भी राजनीति करे, पर बात जब कार्यकर्ताओं के स्वाभिमानऔर सम्मानकी आती है, तो वे उससे कत्तई समझौता नहीं करतीं। यह जानते हुए भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने अभी एक महीना भी नहीं हुआ है और बसपा के दो विधायकों ने ही कमलनाथ सरकार को समर्थन दिया है, फिर भी मानों वे खुद को उस हैसियत में मान रही हों, जैसे कि वे कमलनाथ सरकार ही गिरा सकती हैं। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल ही अलग है।

मध्य प्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 116 विधायकों की जरूरत होती है, लेकिन कांग्रेस के पास 114 विधायक ही हैं। कांग्रेस को बसपा के दो, सपा का एक और चार निर्दलीय विधायकों का समर्थन है। ऐसे में अगर बसपा के दो विधायक अपना समर्थन खींच भी लें, तो आंकड़ा 116 से अधिक ही होगा, जो कि सरकार को बचाए रखने के लिए काफी है। इतना ही नहीं, ये तो मायावती के कमलनाथ सरकार को समर्थन देते वक्त ही साफ हो गया था कि वो केवल अपना सियासी हित साधने की जुगत में ऐसा कर रही हैं। चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद ही मायावती ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए यहां तक कह दिया था कि आम जनता ने अपने दिल पर पत्थर रखकर न चाहते हुए भी कांग्रेस का समर्थन किया है। वास्तव में ये आम जनता की बात मायावती के दिल की ही बात थी।

हालांकि मायावती के लिए किसी को समर्थन देना या झटके में ले लेना कोई नई बात नहीं है। पूर्व में 1996 के विधानसभा चुनाव के बाद यूपी में भाजपा से गठबंधन कर छह-छह महीने बारी-बारी मुख्यमंत्री बनने के बाद छह महीने में ही समर्थन वापस लेने वाली मायावती अब कुछ ऐसी ही कोशिश मध्य प्रदेश में भी करती दिख रही है। अब अगर मध्य प्रदेश सरकार ने अगर मायावती की मांग को मानते हुए बसपा कार्यकर्ताओं के केस वापस लेने का फैसला लिया है, तो ये उसकी महागठबंधन बचाए रखने की कोशिश भर है। कांग्रेस जानती है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत के बावजूद आगामी लोकसभा चुनाव में उसे सत्तासीन भाजपा की मोदी सरकार से टक्कर लेनी है। इसके लिए महागठबंधन ही सबसे कामयाब अस्त्र हो सकता है। भले ही बसपा मुखिया मायावती इस मांग में अपना राजनीतिक हित साध रही हों, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अगर कमलनाथ सरकार उनकी मांग नहीं मानती, तो लोस चुनाव में महागठबंधन की कोशिशों को झटका लग सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ भी ऐसा नहीं चाहते हैं। यही वजह है कि आज कमलनाथ सरकार को मायावती की धमकियों के आगे झुकना पड़ा है।