चुनाव होंगे निरस्त

चुनाव होंगे निरस्त
चुनाव होंगे निरस्त

नोटा यानी 'NONE OF THE ABOVE' सिर्फ यह बताने के लिए ईवीएम मशीनों पर नही होगा कि कितने लोग चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों से नाराज हैं बल्कि अब यह एक काल्पनिक प्रत्याशी के तौर पर देखा जाएगा। हरियाणा देश का पहला राज्य बन गया है जिसने इस व्यवस्था को लागू किया है। इसलिए प्रत्याशी हो जाएं सावधान अगर नोटा से हारे तो नही लड़ पाएंगें चुनाव।

देश मे 2015 से नोटा लागू है। शायद ही कोई ऐसा चुनाव हो जिसमें नोटा के खाते में लोगों ने वोट न किया हो बल्कि कई बार नोटा में पड़े वोटों की संख्या चुनाव लड़ उम्मीदवारों के वोटरों से कहीं ज्यादा होता है। स्थिति अब ये हो गई है कि दिन प्रतिदिन नोटा में वोटरों  की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

नोटा में वोटों की संख्या का बढ़ना यह बताता है कि लोग आजकल अपने प्रत्याशियों से किस कदर नाराज हैं। लोगों को शायद मालूम होगा कि वोटरों की नाराजगी का सबसे बड़ा उदाहरण गोरखपुर में देखने को मिला था। 2001 में लोगों ने सभी पार्टियों को दरकिनार कर किन्नर आशा देवी को मेयर बनाया था। लोगों की इसी नाराजगी को भांपकर ईवीएम में एक ऐसे विकल्प को रखने की बात की गई कि जो नेताओं से नाराज वोटर हैं वो अपनी नाराजगी जाहिर कर सकें।

हालांकि नोटा का इस्तेमाल बखूबी हो रहा है। लेकिन इसमें कड़े प्रावधान ना होने की वजह से इसका कुछ विशेष लाभ नही मिल पा रहा था। अब हरियाणा सरकार ने कुछ ऐसे प्रावधान बना दिए कि कोई भी प्रत्याशी चुनाव लड़ने से पहले हजार बार सोचेगा। पहले जहां नोटा में वोट ज्यादा वोट पड़ने पर दूसरे नंबर पर रहने वाले प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया जाता था अब ऐसा नही होगा। अब अगर नोटा में सबसे ज्यादा पड़े तो चुनाव ही निरस्त हो जाएगा। और जो भी उम्मीदवार उस चुनाव में खड़े होंगे वो दुबारा चुनाव नही लड़ पाएंगे।

हरियाणा देश का पहला राज्य बन गया है जिसने इस नियम को लागू किया है। फिलहाल यह नियम वहां होने वाले 5 नगर निगमों और 2 नगर पालिकाओं के चुनाव में ही लागू हुए हैं। देर से ही सही लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक मजबूत तथा दागी और बदनाम नेताओं को सही सबक सिखाने का यह प्रयास सराहनीय तो है ही। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के अन्य हिस्सों में भी यह नियम लागू हो जाय।