पूर्व उपमुख्यमंत्री के बेटे ने छोड़ा एनसीपी का दामन

पूर्व उपमुख्यमंत्री के बेटे ने छोड़ा एनसीपी का दामन

पहले कहा जाता था कि राजनीति में कोई किसी का नहीं होता। ना तो कोई किसी का पिता होता है और ना ही कोई किसी का पुत्र, पुत्री, भाई या बहन। हालांकि वंशवाद की राजनीति ने वर्तमान में इस मिथक को तोड़ दिया है। आज ये कोई मायने-मतलब नहीं रखता कि बाप-बेटे किस दल से चुनाव मैदान में हैं। अब महाराष्ट्र को ही ले लीजिए। यहां की राजनीति में लोकसभा चुनाव-2019 में कांग्रेस नेता और वर्तमान में विधानसभा में विरोधी पक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटील के बेटे सुजय पाटील कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए थे। अब पूर्व उपमुख्यमंत्री एनसीपी नेता विजय सिंह मोहिते पाटील के बेटे रणजीत सिंह मोहिते पाटील भी एनसीपी छोड़कर भाजपाई हो गए हैं। अब इन नेताओं के दल-बदल की राजनीति से किस दल को कितना लाभ होगा, ये तो चुनाव परिणाम के बाद पता चलेगा, पर इतना जरूर है कि आज वंशवाद की हावी राजनीति के बीच महाराष्ट्र में दलों की मर्यादाएं जरूर टूट गई हैं। ये ठीक है कि जिसकी जिस दल में आस्था होगी, वह उसी का समर्थन करेगा।

निःसंदेह आज भाजपा केंद्र की सत्ता में है। हो सकता है कि भाजपा में जाने वाले नेताओं को उम्मीद हो कि इससे उनको फायदा होगा। पर आधुनिक राजनीति में वे उन दलों को छोड़ने में भी देर नहीं कर रहे, जिसने उन्हें और उनके पिता या सगे-संबंधियों को खूब मान-सम्मान दिया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय सिंह मोहिते पाटील राकांपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व शिक्षा मंत्री भी रहे हैं। वे शरद पवार के बेहद करीबी माने जाते हैं। पर इनके बेटे रणजीत सिंह मोहिते पाटील ने भाजपा से टिकट पाने के लिए एक झटके में उस राकांपा को त्याग दिया, जिसने उनके पिता को उपमुख्यमंत्री जैसा अहम पद सौंपा था। तो क्या गारंटी है कि वे आगे भाजपा से ऐसा नहीं करेंगे? रणजीत सिंह मोहिते पाटील ग्रेजुएट हैं। उन्होंने उस राकांपा को छोड़ दिया, जिसके चलते वे 2009 में 15वीं लोकसभा में सुप्रिया सुले के इस्तीफा देने के बाद पहली बार 2009-12 के बीच राकांपा से ही संसद भी बने थे। उन्होंने राकांपा की ओर से ही राज्यसभा के सदस्य का पदभार भी संभाला है। सोलापुर डिस्टिक सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन भी रह चुके हैं। वर्तमान में भी इंडियन बॉडी बिल्डिंग फेडरेशन के अध्यक्ष हैं।

इसके बाद भी जब परमाढा सीट से उनकी उम्मीदवारी का ऐलान नहीं हुआ और पूर्व आईएएस अफसर प्रभाकर देशमुख का नाम आगे कर दिया गया, तो मोहिते पाटील आज एनसीपी से नाराज होकर भाजपा में चले आए हैं। ये ठीक है कि एनसीपी के गढ़ माने जाने वाले पश्चिम महाराष्ट्र में भाजपा के लिए इसे एक बड़ी सफलता के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा के लिए भी इससे अच्छा मौका और क्या होगा, जब किसी अनुभवी नेता का पुत्र यानी उसकी नई युवा पीढ़ी उससे जुड़ रही है। लेकिन इसके बावजूद भी भाजपा को सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि अभी हाल ही में महाराष्ट्र में भाजपा के गठबंधन साथी शिवसेना ने भी चेताया था कि विरोधी दलों के नेताओं को लोकसभा चुनाव में साथ लाने से पहले विचार किया जाना चाहिए। आज सत्ता मिलते देख वे साथ आ रहे हैं। कल परेशानी खड़ी कर सकते हैं। हो सकता है कि शिवसेना ठीक कह रही हो। आज कई नेता भाजपा की संभावित जीत देखकर किसी मजबूरी में खुद साथ नहीं आ पा रहे हों, तो अपने बेटे-बेटियों को भेज रहे हों। कल किसी दूसरे से वही लाभ मिलता देखेंगे, तो उनके बेटे भाजपा को भी छोड़ दें। वैसे भी ये सियासत है और यहां कुछ भी और कभी भी घटित होने को कभी आश्चर्य नहीं माना जाता है।