निराशा के बावजूद सार्थक सोच रखती हैं

निराशा के बावजूद सार्थक सोच रखती हैं

साइना एनसी भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र में प्रमुख प्रवक्ता हैं। नेता के तौर पर भी इनकी बड़ी पहचान है। फिल्म उद्योग से जुड़े रहने के कारण इनकी लोकप्रियता भी अच्छी-खासी है। पार्टी के कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं और सहज उपलब्ध भी रहती हैं। इस बार ये पार्टी से टिकट चाहती थीं पर टिकट नहीं मिला। इससे थोड़ी निराश हैं। पर ऐसा नहीं कि ये दूसरे नेताओं की तरह पार्टी छोड़ दें। नाराजगी के बावजूद ये पार्टी के साथ हैं। हालांकि ये अपनी बात बहुत विनम्रता से पार्टी हाई कमान तक पहुंचा भी रही हैं। विभिन्न माध्यमों से। सचमुच पार्टी के दूसरे नेताओं को साइना एनसी से सीखना चाहिए।

नाम लेने की बात नहीं लेकिन भाजपा के ही कई ऐसे नेता हैं, जिन्होंने महज इस आशंका पर पार्टी छोड़ दी कि उन्हें टिकट नहीं मिलेगा। कुछ लोगों ने टिकट कटने के बाद पार्टी छोड़ दी। यह सिर्फ भाजपा में ही नहीं बल्कि दूसरी पार्टियों में भी होता है। ऐसे में एनसी जैसे लोग किसी भी पार्टी के लिए अमूल्य हैं। एनसी बस इतना ही कहती हैं कि देश में इतनी सारी पार्टियां हैं, पर महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने की पहल बस ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने और नवीन पटनायक की बीजेडी ने किया है। ममता बनर्जी ने जहां 41 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया है, वहीं नवीन बाबू ने 33 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया है। वैसे इस बार महाराष्ट्र में भाजपा ने भी काफी महिलाओं को टिकट दिया है। भाजपा और शिवसेना राज्य में मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। जिसमें 48 में से 25 सीटों पर भाजपा लड़ रही है। इसमें से उसने सात महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा है, जो कि 28 प्रतिशत बैठता है। शाइना एनसी कहती हैं कि ये भी अच्छी बात है कि महिलाओं को टिकट दिया गया है। पर ये महिलाएं आम नहीं खास हैं। इन सात महिलाओं में से तीन पूनम महाजन, प्रतिमा मुंडे और हिना गावित पार्टी के बड़े नेताओं की बेटियां हैं। इसी तरह स्मिता बाघ पार्टी के एक बड़े नेता की पत्नी हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं कि अगर बड़े नेता की बेटी या पत्नी योग्य है तो उसे टिकट दिया जाए, पर साधारण महिलाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उनका मानना है कि ज्यादातर पार्टियां महिलाओं को टिकट इसलिए नहीं देतीं कि वे मानती हैं कि महिलाएं चुनाव नहीं जीत सकतीं। फिर वे ये भी सोचती हैं कि अगर ये लड़ेंगी तो इनके लिए फंड कहां से आएगा। तब ये पार्टियां भूल जाती हैं कि ये भी किसी की बेटियां या पत्नियां हैं और ये चुनाव जीत भी सकती हैं। तब पार्टियों को महिला वोट बैंक की भी याद नहीं आती, जो कि करीब-करीब पचास प्रतिशत है।

इतने मलाल के बावजूद शाइना एनसी पार्टी के बारे में कुछ भी नकारात्मक नहीं बोलना चाहतीं। एक संवाददाता ने उनसे पूछा कि आपको टिकट क्यों नहीं मिला? क्या आपकी पार्टी महिलाओं का सम्मान नहीं करती है? तो उन्होंने उससे भी बड़ी शालीनता से कहा कि ऐसा पूछकर आप मुझे मुश्किल में डालना चाहते हैं। दरअसल हमारी लड़ाई पुरुष मानसिकता के खिलाफ है। हमें यह लड़ाई लड़नी ही होगी। यह लड़ाई सिर्फ भाजपा में काम करने वाली नेताओं और कार्यकर्ताओं की नहीं है, बल्कि बाकी पार्टियां भी इसी मानसिकता की शिकार हैं। एनसी के इस विचार और व्यवहार ने सचमुच दिल जीत लिया। दलबदलू नेताओं को भी एक बार साइना एनसी की ओर देखना और सोचना चाहिए।