छोटे दलों को साधने की कांग्रेस की कोशिश

छोटे दलों को साधने की कांग्रेस की कोशिश

कई छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर कांग्रेस इन दिनों काम करती दिख रही है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावणकी लोकसभा चुनाव-2019 से ठीक पहले बीमारी के बहाने हुई मुलाकात को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। प्रियंका की राजनीति में एंट्री और राहुल गांधी की दलित साधोनीति का ये एक हिस्सा है। इस मुलाकात के बाद हो सकता है कि कांग्रेस चंद्रशेखर को अपना समर्थन दे दे। वैसे भी जिन्हें कांग्रेस का इतिहास पता है, वे बताते हैं कि कभी ब्राह्मण, सवर्ण, मुस्लिम, महिलाओं के साथ ही दलित भी कांग्रेस के बड़े परंपरागत वोट बैंक थे। तब कांग्रेस का ये जनाधार ऐसा था कि कोई भी विपक्षी दल बराबरी तक नहीं कर पाता था। वक्त के साथ बदली राजनीति में कई जाति आधारित दल बन गए। मुस्लिम,यादव वोट बैंक सपा, तो बसपा दलितों की पार्टी हो गई। इसी तरह कई छोटे-छोटे दल विभिन्न जातियों की राजनीति करने लगे। वास्तव में सपा-बसपा जैसे जाति आधारित दलों ने भी अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए कांग्रेस के परंपरागत मतों में ही सेंधमारी की है।

जब ये परंपरागत व जातिगत वोटर दूर हुए, तो कांग्रेस का एक बहुत बड़ा जनाधार खिसक गया। इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी शासनकाल में काफी महिलाएं भी कांग्रेस से जुड़ी थीं, वे भी जातियों व अन्य कई कारणों से कांग्रेस से दूर हो गई। फिर जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पहल करते हुए अपने इसी खोए जनाधार को वापस पाने के लिए सपा-बसपा से गठबंधन की कोशिश की, तो विफल रहे। इस पर अलग-थलग पड़ी कांग्रेस ने प्रियंका गांधी वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपकर जान फूंकने की कोशिश की। कांग्रेस ये जानती है कि छोटे दलों के उदय से ही कांग्रेस की यहां दुर्गति हुई है। यही वह वजह है कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा जैसे बड़े दलों संग गठबंधन न होने पर छोटे दलों या यूं कहें कि चिल्लरदलों से गठबंधन की कोशिश तेज कर दी है। भीम आर्मी प्रमुख से मुलाकात के साथ ही प्रियंका की अगुवाई में शिवपाल सिंह यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी-लोहिया, पीस पार्टी, जनवादी पार्टी और निषाद पार्टी जैसे छोटे दलों से भी गठबंधन की कोशिशें हो रही हैं। भले ही ये पार्टियां छोटी हों, पर अलग-अलग जिलों और अलग-अलग जातियों में इनका अच्छा-खासा प्रभाव है।

जैसे निषाद पार्टी की पूर्वी यूपी खासकर गोरखपुर व उसके आसपास के क्षेत्रों में मछुआरों में अच्छी पैठ है। पीस पार्टी की पूर्वांचल के मुस्लिमों में गहरी पैठ है। हो सकता है कि कांग्रेस इन वोटरों को अपने साथ लाने के लिए इन दलों की शक्ति के हिसाब से एक या दो लोकसभा सीटें छोड़ दे। जहां तक भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावणका सवाल है, तो कांग्रेस जानती है कि चंद्रशेखर बसपा मुखिया मायावती की काट तो नहीं हो सकते, पर दलित मतों में सेंधमारी जरूर कर सकते है। खासकर वेस्ट यूपी में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। यहां सहारनपुर मे 21.73, मुजफ्फरनगर में 13.50, मेरठ में 18.44, बागपत में 10,98, गाजियाबाद में 18.40, गौतुमबुद्धनगर में 16.31, बिजनौर में 20.94, बुलंदशहर में 20.21, अलीगढ़ में 21.20, आगरा में 21.78. मुरादाबाद में 15.86, बरेली में 12.65, रामपुर में 13.38 प्रतिशत दलित आबादी है। इन क्षेत्रों में चंद्रशेखर दलितों में उभरता चेहरा हैं। सहारनपुर और शब्बीरपुर हिंसा के बाद चंद्रशेखर और भीम आर्मी एकाएक सुर्खियों में आई थी। तब कांग्रेस ने चंद्रशेखर से हमदर्दी दिखाने में कोई मौका नहीं छोड़ा था। यहां तक की राहुल गांधी शुरू में ही हिंसा के बाद सहारनपुर पहुंच गए थे। अब प्रियंका-चंद्रशेखर की मुलाकात और चंद्रशेखर के बिजनौर जिले की सुरक्षित नगीना सीट से कांग्रेस सिंबल पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताने पर दोनों के साथ आने के नजरिए को बल मिल रहा है।