महिलाओं पर फिर पाबंदी

महिलाओं पर फिर पाबंदी

हम सभी जानते हैं कि जब आदमी जन्म लेता है, तो हर धर्म या संप्रदाय के कुछ संस्कारों से उसे गुजरना पड़ता है। हर धर्म में पुरुष और महिलाएं उसमें बराबर शरीक भी होते हैं। शादी-ब्याह या निकाह, कोई भी मौका हो, स्त्री, पुरुष हो या बच्चे, सभी इस खुशी में शरीक होते हैं। दो परिवारों और दो आत्माओं के बीच बन रहे इस संबंध में किसी के भी उत्साह में भी रत्तीभर की कमी नहीं होती। अब कोई कहे कि बारात में महिलाएं नहीं जाएंगी, क्योंकि बारात में जाने से वे बेपर्दा होगी और ये शरीयत के खिलाफ है, तो इसे क्या कहेंगे? कुछ ऐसा ही फतवा जारी कर देवबंद पता नहीं मुस्लिम समाज को क्या संदेश देना चाहता है?

आम तौर पर घर से जब दूल्हा निकलता है, तो उसे बारात कहते हैं और उसमें पुरुष, बच्चों के साथ ही महिलाएं भी शामिल होती रही हैं। अब देवबंद इस पर फतवा जारी कर इस बारात में महिलाओं के शामिल होने को लेकर पाबंदी लगाने की जो कोशिश की है, वास्तव में उसके पीछे उसकी पुरातन और विकृत मानसिकता ही काम कर रही है। गैर मर्द, बेपर्दा होना और शरीयत के खिलाफ होने जैसी बातों का हवाला देने के पीछे उसकी असली सोच बस इतनी है कि वह किसी भी कीमत पर नारी समाज को आगे आता नहीं देखना चाहता। कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जैसे वह मुस्लिम महिलाओं को खुश देखना ही नहीं चाहता? हालांकि हमारा किसी समाज या संगठन की बुराई करने का कोई उद्देश्य नहीं है, विरोध है, तो बस इतना कि किसी समारोह में शामिल होने का अधिकार छीनकर भला देवबंद को क्या लाभ होगा? ऐसा करने का अधिकार भला कोई भी संस्था को कैसे है?

अब तीन तलाक को ही ले लीजिए, इस मामले में मुस्लिम समाज में जो रवैया था, उससे काफी मुस्लिम महिलाएं परेशान थीं। लेकिन देवबंद जैसे संगठन केवल अपनी नाक ऊंची रखने के लिए हमेशा इसके विरोध में खड़े रहे। केंद्र के फैसले और तीन तलाक पर कानून बन जाने से तीन तलाक पीड़ित अनेक महिलाओं को काफी राहत मिली है। बावजूद इसके मौलाना लोग अपनी आदत से बाज नहीं आ रहे हैं। अभी हाल ही में देवबंद के मौलाना ने एक फतवा जारी किया था कि शादी-पार्टियों में मुस्लिम महिलाएं पुरुषों के साथ खाना नहीं खा सकतीं। अब आधुनिक समाज में ऐसे फतवों की क्या महत्ता है और इसका पालन किस हद तक हो पाएगा, ये तो मौलाना लोगों को खुद ही सोचना चाहिए।

कभी मुस्लिम महिलाओं का नौकरी करने, तो कभी एंड्रॉयड मोबाइल का इस्तेमाल करने, कभी जिंस के कपड़े पहनने, तो कभी शादी में डीजे बजाने पर निकाह न पढ़ाने का मौलवियों को फरमान...और अब महिलाओं के बारात में जाने को नाजायज बताकर देवबंद जैसे संगठन भले ही इतराते रहे हों, लेकिन हकीकत यही है कि इससे वे एक तरह से वैश्विक उपहास के पात्र ही बनते हैं। अब बारात में अगर महिलाएं जाती हैं, तो भला इससे किसी समाज का क्या अहित हो सकता है? इस पर भी देवबंद को आपत्ति है और उसने फतवा जारी कर इसे भी नाजायज और गुनाह करार दिया है। ऐेसे फतवे इस समाज के लिए कितना लाभप्रद है, ये तो देवबंद से ये फरमान जारी करने वाले जाने, लेकिन आधुनिक समाज में अगर ऐसे ही फरमान जारी होते रहे, तो मुस्लिम समाज न तो कभी विकास की मुख्यधारा से जुड़ पाएगा और न ही समाज का सही मायने में उत्थान हो सकेगा। अब पुरुष के साथ ही महिला समाज भी अपने खिलाफ हो रहे हर उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही हैं, तो पुरुषों में भी बुद्धिजीवी समाज वाहियात विचारों और कुप्रथाओं को त्यागने में ही भलाई मान रहा है। इसके बावजूद भी कुछ मौलाना किस्म के लोग अपनी उल-जुलूल, वाहियात फतवा या फरमान जारी करने की बुरी आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं।