देसी सामान बेच कर जिंदगी संवारते हैं बैगा

देसी सामान बेच कर जिंदगी संवारते हैं बैगा

सैकड़ों वर्षों से भारत के अनेक क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कई नाम वाली जनजातियां रहती आयी हैं। अगर वर्तमान जनसंख्या का विश्लेषण करें, तो इस समय अपने देश में कुल 663 जनजातियां हैं। पहले इनकी जिंदगी आसान थी, क्योंकि भौतिकता की इतनी मारामारी नहीं थी, लेकिन आज हमने अपनी भौतिक आवश्यकताएं काफी बढ़ा ली हैं, किन्तु भारत के कई राज्यों में रह रहीं अन्य जनजातियों की तरह बैगा लोगों की जिंदगी जीने में पहले मुश्किलें काफी थीं, लेकिन धेबर आयोग ने 1960-61 में अनुसूचित आदिवासियों के बीच विकास की दर में असमानता पर ध्यान दिया, इसीलिए चौथी पंचवर्षीय योजना में आदिवासियों के भीतर से उप श्रेणी बनाई गयी, जिससे निचले स्तर पर विकास के कार्यक्रम क्रियान्वयन का रास्ता सूझा। इसके आधार पर आगे चलकर विकास के क्रमिक कार्यक्रम निर्धारित हुए।

केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को प्रेरित कर पीवीटीजी (प्रिमिटिव ट्राइबल ग्रुप) यानी विशेष खतरे में घिरी जनजातियों पर काम तेजी से शुरू कराने में भूमिका निभाई। इसी श्रेणी में बैगा जनों के कल्याण के कार्य भी आगे बढ़े। आयोग ने अपने अध्ययन में बैगा उप श्रेणी को भी पीवीटीजी के दायरे में लाने से इस समूह के लोगों की दिलचस्पी कृषि कार्यों की ओर जाएगा। इससे पहले ये जनजातियां जंगली जानवरों का शिकार कर भरण-पोषण किया करते थे। अन्य जनजातियों की तुलना में बैगा में बेहद कम साक्षरता दर रही है, इसलिए अपने समुदाय के प्रति जागरूकता न के बराबर पायी जाती रही।

बैगा में शिक्षा के स्तर पर ध्यान दें, तो 12762 पुरुषों साक्षर हैं, लेकिन महिलाएं ज्यादा यानी 13218 साक्षर हैं, लेकिन उनकी जनसंख्या की दृष्टि से देखें तो हालत यह है कि जिन बैगा लोगों ने स्कूल का मुंह नहीं देखा, उनमें पुरुष 1073 रहे, जबकि महिलाएं 674 ही रहीं। निरक्षर पुरुष रहे 6001, जबकि महिलाएं 8551 रहीं।

2011 की जनगणना से पता चला कि देश भर में 22.19 प्रतिशत जनजातीय समुदाय के बाशिंदे रहते हैं। एमपी में करीब 14.69 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 7.5 प्रतिशत जनजातीय हैं। इन लोगों एमपी और छत्तीसगढ़ में बैगा लोगों की संख्या 51 प्रतिशत है। ये लोग मध्य प्रदेश की कुल जनसंख्या में से 21.1 प्रतिशत हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इनका दबदबा बढ़ा है और इस राज्य में बैगा जनजाति की आबादी 30.6 प्रतिशत है। ये दोनों राज्य बैगा जनजाति बहुल भी हैं।

इन्हीं में से एक है- बैगा जनजाति। इन्हें भुइया, भूमिया, भूमियाराजा, भूमिज और भूमिजा भी कहते हैं। परंपरागत रूप से ये जनजाति मुख्य रूप से एमपी और छत्तीसगढ़ में तो दिखती है, लेकिन यूपी में भी इनके कम संख्या में ही सही, ठिकाने दिखते हैं। बैगा जनजाति की सबसे बड़ी जनसंख्या एमपी में है। राज्य में बैगा की जनसंख्या 4 लाख 14 हजार पांच सौ छब्बीस है और दूसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ है और यहां 89 हजार 7 सौ 44 बैगा के लोग रहते हैं। ये जनजाति दूरदराज के जंगली क्षेत्रों में किसी तरह आबाद है, जबकि यूपी में 47 हजार 3 सौ 93 और झारखंड में 3 हजार 5 सौ 82 सदस्य बैगा के हैं।

एमपी के मध्य भूभाग के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मुंडा और कोलरी लोग बैगा जनजाति की श्रेणी में भी शामिल माने गए हैं। पेशे से जड़ी-बूटियों के कार्यों में लिप्त होने के कारण इसे ही बैगा लोगों ने अपनी कमाई का मुख्य आधार बनाया है और आज भी छोटे-बड़े शहरों के निचले क्षेत्रों में ये तंबू लगाकर जड़ी-बूटी कूटते-पीसते और उन्हें कामचलाऊ पैकेट में भरकर बेचते मिल जाते हैं। भारतीय शहरों की सड़कों के किनारों पर डेरा डाले हजारों के छोटे बंजारों के बीच बैगा जनजाति समुदाय के लोग भी मिल जाते हैं। इन राज्यों की जनजातियों में से विकास के नजरिये से इन्हें पिछड़ी जनजातियों की भीतर विशेष पिछड़ी जनजातीय समूहमें शुमार किया गया है। ऐसा करने के पीछे सरकारी दृष्टि से इन पर केन्द्रित योजनाएं बना कर इनका जीवन सुधारना भी रहा है, लेकिन बैगा लोग आधुनिकता की चमक से दूरी बनाये रखने में दिलचस्पी लेते हैं।

इसलिए पिछले दस वर्षों के दौरान केन्द्र और राज्य सरकारों  ने बैगा लोगों के विकास के लिए खास कोशिशें कीं, जो विकास के रूप में उनके बीच थोड़ी ही चमक ला पायी हैं, क्योंकि इस जनजाति के लोग लम्बे समय तक साक्षर होने के रुझान से दूरी बनाये हुए थे, लेकिन आज भी इनके टोले से इक्का-दुक्का लोग ही आगे आकर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं। वर्तमान  में 75 जनजातियां मिलती हैं, जिन्हें इस बैगा समूह में रखा गया है, जिनमें एमपी की तीन यानी बैगा, सहरिया और भारिया हैं, लेकिन इस मामले में छत्तीसगढ़ की पांच अर्थात अबूझमाड़िया, बैगा, बिरहोर, कमार और पहाड़ीकोरवा जनजातियों को इस श्रेणी में जगह दी गयी है।

किसे स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, और इंटरनेट जैसी सहूलियत से दूर रहने का शौक होता है, लेकिन आज भी एमपी की सतपुड़ा स्थित पहाड़ी क्षेत्रों, नर्मदा और इसकी सहायक नदियों के इर्द-गिर्द के इलाकों सहित छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के मैकल पर्वतीय क्षेत्र में बैगा जनजाति आज भी भीख मानकर जिंदगी बसर करने के बजाय खेती, वनोपज इकठ्ठा करने, आखेट का शौक रखने और हस्तकला के हुनर यानी बांस निर्मित सामग्री बेचकर अपनी रोजी-रोटी के दैनिक इंतजाम करते आसानी से दिख जाते हैं, लेकिन बाजार के इस दौर में ये जनजाति भी योगदान दे रही है और वस्तुओं के क्रय-विक्रय में जुटी हुई है।

सुखद तथ्य यह है कि आज बैगा लोगों में जीवन की समझ बेहतर हुई है और वे अपने बच्चों के भविष्य को लेकर अच्छा सोचते और करते हैं। इस तरह कह सकते हैं कि आज भारत में अन्य समुदाय की तरह बैगा जनजातीय के लोग भले ही देश की मुख्यधारा में समाहित होना न चाहें, लेकिन साक्षरता और जागरूकता बढ़ने के कारण ये समाज भी कल राष्ट्र के लिए सार्थक करने को उतावला है। इसे देखते हुए उम्मीद कर सकते हैं कि बैगा लोग अपने स्वाभिमान और संस्कृति को सहेजने के साथ ही अपना दमखम भी एक न एक दिन प्रदर्शित करके रहेंगे।