राजनीतिक बिसात पर भाजपा ने फिर दी राहुल को मात

राजनीतिक बिसात पर भाजपा ने फिर दी राहुल को मात

राजनीति बच्चों का खेल नहीं है, यह बात लगता है कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व को समझ में नहीं आ रही है। गोवा की राजनीति में पिछले कुछ समय में जो कुछ भी हुआ है और हो रहा है, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है जहाँ राहुल गांधी और कांग्रेस बड़े मौकों को भुनाने में पूरी तरह से असफल साबित हुई और उनकी टीम भी नौसिखियों की तरह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के शानदार अनुभव के सामने ताश के पत्तों की तरह ढेर हो गई।

राहुल ने राज्यों में नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे लाने के प्रयोग के तहत गोवा के पुराने नेतृत्व को बदलते हुए तीन नये नेताओं को चुना था। इन नेताओं में गोवा कांग्रेस के अध्यक्ष गिरीश चोंडकर, गोवा के पार्टी प्रभारी चेल्ला कुमार और सीएलपी नेता चंद्रकांत कवलेकर शामिल थे। पर यह टीम पर्दे के पीछे होने वाली राजनीतिक उठापटक और सत्ता की राजनीति से जुड़े तमाम समीकरणों को साधने में विफल रही है।

राहुल गाँधी ने जिस तरह से वरिष्ठों की अनदेखी कर कम अनुभवी नेताओं को तरजीह दी, वही उनको उल्टा पड़ने लगी। कांग्रेस के विधायकों में प्रताप सिंह राणे, रवि नाईक, लुईजिनो फलेरियो और दिगंबर कामत जैसे चार पूर्व मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में कम अनुभवी नेताओं को दी गई तरजीह ने इन चारों को दुखी कर दिया। कांग्रेस में खेमेबाजी बढती चली गई। इसका भी खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा।

गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर के स्वस्थ्य को लेकर जारी अटकलों के बीच चंद रोज पहले तक गोवा में राजनीतिक समीकरण बदलते नज़र आ रहे थे। ऐसा लगाने लगा था कि कांग्रेस एक बार फिर गोवा में सत्ता में वापसी कर लेगी क्योकि न सिर्फ वह राज्य विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी, वरन पर्रीकर के स्वस्थ्य के अटकलों के बीच उसके बहुमत के आसार भी नज़र आने लगे थे। कुछ विधायकों के पला बदलकर कांग्रेस को समर्थन की बात भी सामने आ रही थी।

इन स्थितियों में कांग्रेस नेतृत्व अगर सूझबूझ से काम लेता या सही कदम उठाता तो संभव था कि वह सत्ता में वापस आ भी जाती। पर हुआ उल्टा, क्योंकि राजनीति की बिसात पर भाजपा के सधे नेतृत्व ने कांग्रेस को मात दे दी। भाजपा ने न सिर्फ अपना कुनबा संभाला, वल्कि कांग्रेस के ही विधायकों को तोड़कर अपने साथ शामिल कर लिया। हाल यह है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये विधायक खुलेआम कह रहे हैं कि अभी चार और विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने वाले हैं। 

राज्य में यह लगातार दूसरा अवसर है कि जो बाज़ी कांग्रेस के हाँथ में थी, वह न सिर्फ उससे छिन गयी, वरन प्रतिद्वंद्वी भाजपा के हाथ चली गई। राज्य में चुनावों के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी कांग्रेस के नेता सोते रह गए और भाजपा अपने बेहतरीन नेतृत्व कौशल के दम पर कम सीटे लाकर भी गठबंधन कर सरकार बना ले गई। कमोबेश यही स्थिति इस बार भी दिखी है जब कांग्रेस के नेतृत्व को यही नहीं पता चला कि उनकी पार्टी में हो क्या रहा है। उन्हें भनक तक नहीं लगी कि उनके विधायक पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो कांग्रेस का भगवान ही मालिक है।