विपक्षी नेताओं को शामिल करने में सावधान रहे भाजपा

विपक्षी नेताओं को शामिल करने में सावधान रहे भाजपा

कहा गया है धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी। भावार्थ ये कि धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री-इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामनाके एक संपादकीय में महाराष्ट्र में अपने गठबंधन साथी भाजपा को लोकसभा चुनाव-2019 में विपक्षी दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल करते वक्त सावधानी बरतने की सलाह को इसी नजरिए से देखा जा सकता है। शिवसेना ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण विखे पाटील के बेटे सुजॉय विखे पाटील को भाजपा में शामिल किए जाने के बाद भाजपा को ऐसी सलाह दी है। सुजॉय हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं। दरअसल कांग्रेस से गठबंधन के तहत अहमदनगर सीट एनसीपी के खाते में गई है, जबकि यह सीट विखे पाटील का गृह क्षेत्र मानी जाती है। इसी सीट से विखे पाटील के बेटे सुजॉय चुनाव लड़ना चाहते थे, पर टिकट न मिलने से नाराज होकर वे भाजपा में आ गए हैं। इसे कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

इसके बाद गौर करने वाला घटनाक्रम ये है कि अपने बेटे सुजॉय के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेसी नेता और महाराष्ट्र के नेता विपक्ष राधाकृष्ण विखे पाटील हाल ही में पहली बार मीडिया के सामने आए थे। उन्होंने यहां तक कहा कि उनके बेटे ने ये फैसला उनसे पूछकर नहीं लिया है। हालांकि उन्होंने तब एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार पर भी निशाना साधा और यहां तक कहा कि वे एनसीपी उम्मीदवार के लिए प्रचार नहीं करेंगे। पर केवल प्रचार न करने की बात कहने के बाद क्या गारंटी कि वो बाद में किसी मुद्दे पर अपने बेटे को भाजपा-शिवसेना गठबंधन के विरोध में खड़ा नहीं कर सकते? भाजपा को अपने पुराने साथी शिवसेना के बताए पुराने अनुभव पर भी ध्यान देने की जरूरत है। सामनामें ही शिवसेना ने पुराने अनुभव को शेयर करते हुए कहा है कि कैसे पूर्व में राधाकृष्ण विखे पाटील ने उन्हें धोखा दिया था। राधाकृष्ण विखे पाटील पहले शिवसेना के सदस्य थे। शिवसेना ने उन्हें और उनके पिता को राज्य और केंद्र सरकार में मंत्री तक बनाया। पर सरकार के सत्ता से बाहर जाने पर वह शिवसेना के खिलाफ हो गए थे।

शिवसेना की ये सलाह बिल्कुल सामयिक है कि कांग्रेस और एनसीपी से नेताओं का आना आज लाभकारी लग सकता है, पर इससे भविष्य में समस्या होगी। जो लोग आज आ रहे हैं, क्योंकि सत्ता है। जब कुछ नहीं होगा, वे अन्य लोगों से संबंध जोड़ेंगे। इस लोकसभा चुनाव-2019 को भी एक धर्मयुद्ध के तौर पर देखने की जरूरत है। इस लोकतंत्र में जनता की ओर से प्रत्याशियों का चयन में पार्टी प्रत्याशी तो अहमियत रखता ही है, संबंधित पार्टी का पुराना इतिहास भी मतदाता परखते हैं। नि:संदेह भाजपा-शिवसेना गठबंधन महाराष्ट्र में एक बड़ी राजनीतिक पार्टी है। ऐसे में उसका कर्तव्य और बढ़ जाता है कि वो ऐसे प्रत्याशियों का चयन करे, जो वास्तव में सरकार के जनहितैषी कार्यों में एक सच्चे साथी बनकर योगदान दे सकें। केवल चुनाव जीतने की गरज से आने वाले उम्मीदवारों पर भी पैनी निगाह रखने की जरूरत है। अगर गठबंधन का साथी किसी प्रत्याशी विशेष पर सवाल उठा रहा है और यहां तक कि उसे परखने का हवाला तक दे रहा है, तो मित्र धर्म भी यही कहता है कि उसकी बातों को गंभीरता से लिया जाए। हो सकता है कि शिवसेना सही हो। ये भी हो सकता है कि भाजपा ने ठोक-बजाकर देखने के बाद ही सुजॉय को साथ लिया हो। पर अगर शिवसेना कह रही है, तो विचार करने में हर्ज ही क्या है।