मनोरोगियों पर राष्ट्रपति की चिंता का कारण

मनोरोगियों पर राष्ट्रपति की चिंता का कारण

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का मानसिक स्वास्थ्य पर चिंता करना आज चर्चा का विषय बना हुआ है। शायद यह पहला मौका है जब देश के राष्ट्रपति ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की है। आखिर देश के राष्ट्रपति को मानसिक स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त करने की जरुरत क्यों मह्शूश हुई। जबकि पिछले दो वर्षों से पूरे देश में मेंटल हेल्थकेयर एक्ट लागू है। राष्ट्रपति का मानसिक स्वास्थ्य को लेकर दिखाई गई गंभीरता कहीं न कहीं यह साबित करता है कि देश के लिए मानसिक बीमारी आज एक बहूत बड़ी समस्या बन गई है। इस बीमारी से न सिर्फ लोग मर रहें हैं बल्कि ऐसे मरीजों की वजह से उनका परिवार भी बेवजह मानसिक तनाव का शिकार हो रहा है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने यहाँ तक दिया है कि देश काफी हद तक मानसिक महामारी की कगार पर है। उन्होंने कहा है कि शहरीकरण के बढ़ने के साथ मनोरोगी भी तेजी से बढ़ने लगे हैं। सबसे चौंकाने वाली उनकी बात यह कहना है कि नब्बे प्रतिशत मानसिक रोगियों को इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। राष्ट्रपति ने सीधेसीधे केंद्र और देश के राज्यों की सरकारों को एक आइना दिखाया है। उन्होंने साफ़ तौर पर कह दिया है कि आप लोग मानसिक रोगियों को लेकर बिलकुल भी गंभीर नहीं हैं। 2017 में मेंटल हेल्थ केयर एक्ट शायद इसी उम्मीद में लाया गया था कि मानसिक रोगियों का उपचार सही से हो सके। उनकी मानिटरिंग उचित और इमानदारी पूर्वक हो सके। लेकिन उस एक्ट को लेकर देश के राज्यों की सरकारें कितनी गंभीर हैं उसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि आज तक भारत के दस राज्य अपने यहाँ उस एक्ट को लागू ही नहीं कर पायें हैं। जबकि खासकर मानसिक रोगियों के लिए ही उस एक्ट को बनाया गया था। एक अनुमान के मुताबिक़ देश में इस समय 14 फीसदी लोगों को मानसिक चिकित्सा की जरुरत है लेकिन संसाधन के अभाव में ऐसे रोगियों का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। आज देश की लगभग बीस प्रतिशत आबादी डिप्रेशन की शिकार है। जिसमे युवाओं की संख्या ज्यादा है। आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। बढ़ते तनाव, भागदौड़ और कम्पटीशन के कारण मनोरोगियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। राष्ट्रपति की चिंता इस बात पर तो है ही कि मनोरोगियों की संख्या क्यों बढ़ रही है बल्कि इस बात पर भी है कि आखिर एक एक्ट बन जाने के बाद भी इनका समुचित इलाज क्यों नहीं हो पा रहा है। देश के प्रधानमन्त्री मोदी बारबार देश के नौजवानों की बात करते हैं। कहा जाता है कि भारत दुनिया का सबसे नौजवान देश है। जबकि आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश नौजवान डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। ऐसे में देश के विकाश में योगदान देने वाले नौजवान ही जब बीमार हो जायेंगे तो कैसे होगा देश का विकाश। स्तिथि गंभीर है, खासकर तब जब देश के राष्ट्रपति ने इसका संज्ञान लिया हो। बात अभी बहूत ज्यादा नहीं बिगड़ी है। अभी मौका हाथ से निकला नहीं है। जरुरत है राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की चिंता को समझना। जरुरत है उनकी चिंता पर अमल करना। जरुरत है मेंटल हेल्थकेयर एक्ट की गंभीरता को समझना। ताकि मनोरोगियों को सही समय पर पहचान कर उनका समुचित इलाज किया जा सके। एक्ट में कहा गया है देश का कोई भी अस्पताल जिसे किसी भी रूप में सरकारी सहायता मिली हो या मिल रही है, वह किसी भी मनोरोगी को इलाज से मना नहीं कर सकता। उस अस्पताल को रियायती दर पर मानसिक रोगी का इलाज करना ही होगा। जो राज्य मेंटल हेल्थकेयर एक्ट को राजनैतिक दुर्भावना की वजह से अपने यहाँ लागू नहीं कर पा रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि रोगी किसी ख़ास राजनैतिक पार्टी का समर्थक नहीं हो सकता। वो किसी भी पार्टी और किसी भी दल से जुड़ा हो सकता है। लेकिन वो स्थाई तौर पर उनके राज्य का ही रहने वाला है। बेहतर यही होता कि देश की सरकार कुछ ऐसी पहल करे ताकि सभी राज्य एक मिशन के तहत अपनेअपने राज्यों में इस एक्ट को गंभीरता से लागू करें ताकि न सिर्फ मानसिक रोगियों का बेहतर और समय से इलाज हो सके बल्कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की चिंताओं को भी दूर किया जा सके।