स्वर्ग में गईं स्वराज

स्वर्ग में गईं स्वराज

सुषमा स्वराज सबको छोड़कर चली गईं। एक प्रखर वक्ता, एक सफल अधिवक्ता, एक मंझी हुईं राजनेत्री और एक मृदुभाषी महिला का यूँ चले जाना सबको अखर रहा है। दो दिन पहले उन्होंने अपने जीवन के आखिरी ट्वीट में अपनी अंतिम यात्रा का इशारा कर दिया था। जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक बिल के पास होने के बाद प्रधानमन्त्री को किया गया उनका वो ट्वीट याद कर लोग भाउक हो रहें हैं। उन्होंने लिखा था कि, प्रधानमन्त्री जी आपका हार्दिक अभिनन्दन। मै अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी। ईश्वर भी शायद अपनी चहेती आत्मा की अंतिम इच्छा पूरी करने की जुगत में था। उनकी भरपाई मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव है। उनके जाने के बाद देश के लाखों करोड़ों लोगों का रोना यह बताने के लिए प्रयाप्त है कि वो कितनी सह्रदय इंसान थीं ।
14 फ़रवरी 1952 में जन्मी सुषमा स्वराज महज 67 साल की थीं। लेकिन इतनी ही उम्र में उन्होंने कई सौ साल वाले काम कर दिए थे। सुषमा छात्र जीवन से ही बड़ी होनहार रहीं। जिस कालेज में वो पढ़तीं थीं वहां उन्हें बेस्ट छात्रा का अवार्ड मिला था। 1973 में सुषमा ने सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया था। 1975 में अपने सहयोगी वकील स्वराज कौशल से उन्होंने शादी की। क्षेत्र कोई भी हो, हर जगह सुषमा ने अपने काम से सबको प्रभावित किया। महज 25 साल की उम्र में वो हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री बनीं थीं। उस समय देश में इस बात की चर्चा होती थी कि कैसे एक 25 साल की महिला कैबिनेट बन गईं। 1970 में जब वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़ीं तो छात्रों को एक अलग मंत्र दिया। उन्हें बताया कि कैसे विद्यार्थी परिषद् को आगे बढ़ाना है। आपातकालीन के दौरान उन्होंने जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन में खुलकर हिस्सा लिया। उस समय महिलायें आसानी से राजनीति में नहीं आना चाहती थी, जिस समय सुषमा महज 25 साल की उम्र में हरियाणा से विधान सभा चुनाव लड़ीं थीं। हरियाणा के अम्बाला छावनी विधान सभा क्षेत्र की जनता ने महज 25 साल की एक लड़की को विजय श्री का आशीर्वाद दिया था। जहाँ तक उनके उपलब्धियों की बात है तो वो देश की पहली महिला थीं जो 1998 में दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं थीं। भारतीय जनता पार्टी में अगर पहली बार कोई महिला राष्ट्रीय प्रवक्ता बनीं थीं, तो वो थीं सुषमा स्वराज। वह पहली महिला नेत्री थीं, जो सबसे पहले विदेश मंत्री बनीं। यही नहीं, उन्हें आउटस्टैंडिंग पार्लियामेंटेरियन अवार्ड से भी नवाजा गया था। इसके अलावा वो भारतीय जनता पार्टी की पहली नेत्री थीं, जिन्हें पार्टी ने 2009 में विपक्ष का नेता बनाया था। विदेश मंत्री रहते उन्होंने देश की कई महिलाओं को देश में बुलाने में मदद की जो किसी कानूनी अड़चन के चलते अपने वतन नहीं लौट पा रहीं थीं। कोई भी महिला बेधड़क होकर उन्हें अपनी परेशानी बता देती थी। शायद इस उम्मीद में कि उनकी समस्या को सुषमा सुलझा देंगीं। सुषमा स्वराज संसद में बोलते समय अक्सर शेरों शायरी के जरिये बड़ी–बड़ी बातें कह जाती थीं। ऐसे में उनके अचानक चले जाने के बाद ख़ालिद शरीफ़ का एक शेर “बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई, इक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया”। बड़ा ही मौजू लगता है। उनकी मौत मंगलवार की रात जरुर हुई लेकिन वह रात देश के खासकर भाजपा के लिए अमंगल साबित हुई। नौ बार संसद रहीं सुषमा स्वराज के ट्वीटर पर एक करोड़ 20 लाख फ़ालोवर थे, जो यह बताता है कि उनकी लोकप्रियता कितनी थी। बीते लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं का टिकट काट दिया गया था। जबकि सुषमा स्वराज ने चुनाव लड़ने से खुद ही मना कर दिया था। कई लोगों को उनके चुनाव न लड़ने का निर्णय पसंद नहीं आया था। लोगों से पूछने पर उन्होंने बड़ी सादगी से उस समय कहा था कि उनके चुनाव लड़ने न लड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने सबसे अपील की थी कि मोदी को पुनः प्रधानमन्त्री बनाने के लिए भाजपा के सभी उम्मीदवारों को जीताने के लिए मेहनत करें। टिकट बंटवारे के समय  भाजपा के कई नेता नाराज हो गए थे लेकिन सुषमा पार्टी के साथ खड़ी रहीं। आज उनकी अंतिम यात्रा में पार्टी भी यह समझ रही है कि सुषमा की क्या भूमिका रही। बुधवार को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। सूर्य प्रतिदिन उदय होगा और प्रतिदिन अस्त होगा लेकिन बुधवार को सूर्य जब अस्त होगा तो कहीं सुषमा स्वराज के रूप में भारतीय राजनीति का एक ऐसा सूर्य अस्त होगा जो शायद कभी उदय नहीं होगा।