यूएपीए आतंकवादियों के विरूद्ध बनेगा मज़बूत हथियार

यूएपीए आतंकवादियों के विरूद्ध बनेगा मज़बूत हथियार

यू ए पी ए यानि अनलाफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट संशोधन विधेयक के पारित हो जाने के बाद विपक्षी पार्टियों में खलबली मची हुई है। यह संशोधन बिल पहले लोकसभा और फिर बाद में शुक्रवार को राज्यसभा से पास हो गया। अब किसी भी ऐसे व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किया जा सकता है जो आतंकवादियों को किसी भी रूप में सपोर्ट करता हो। पहले किसी ख़ास संगठन के लिए ही इस कानून का इस्तेमाल होता था। विपक्ष का आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग कर किसी को भी फंसाया जा सकता है। यह सही बात है कि कभीकभी हमारे देश में कानून का दुरुपयोग होता है। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं कि कानून बनाना ही बंद कर दिया जाय। इस कानून का स्वरुप कैसा होगा, जिस मकशद को पूरा करने के लिए इस कानून को बनाया गया है, उसके क्या परिणाम निकलेंगे, इन सारी बातों का पता तभी चलेगा, जब यह कानून प्रभावी होगा।

यू ए पी ए के तहत राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को ज्यादा शक्ति देने की बात की जा रही है। 2008 में हुए मुंबई हमले के बाद एन आई ए का गठन हुआ। यानि एन आई ए 2009 से पूरी तरह से सक्रीय है। इसका असर भी दीखता है। आतंवादियों से निपटने के लिए कांग्रेस शासन में ही इसका गठन हुआ। कांग्रेस शासन में ही आतंवाद के खिलाफ देश में एक कानून बना। आज जब इसमें संशोधन हो रहा है तो कांग्रेस ही इसके विरोध में खड़ी है। विरोध में तो लगभग सभी विपक्षी पार्टियाँ हैं। बसपा, तृणमूल कांग्रेस, एन सीपी और राजद ने तो सदन में ही चर्चा के दौरान इसका जमकर विरोध किया। गृह मंत्री अमित शाह ने सभी विपक्षी नेताओं आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की। लेकिन विपक्षी इस विधेयक के विरोध में अंत तक खड़े रहे। हालांकि विपक्षियों के विरोध के बावजूद यह बिल सदन के दोनों सदनों से पास हो गया। इस बिल को लेकर वर्तमान सरकार और गृहमंत्री अमित शाह की मंशा को लेकर विपक्ष की आशंका समझ से परे है। विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि एन आई ए अपनी शक्ति का दुरुपयोग करेगा। असहमति व्यक्त करने वाले किसी भी व्यक्ति को बड़ी आसानी से इस कानून के तहत फंसाया जा सकता है। जहाँ तक इस कानून के तहत एन आई ए को मिली शक्ति की बात है, तो वो सही है कि अब एन आई ए किसी भी राज्य में वगैर वहां की सरकार के परमिशन के जाकर संदिग्ध व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाई कर सकती है। अगर देश की इतनी संवेदनशील एजेंसी को यह अधिकार मिला है तो इसमें बुराई क्या है। आखिकार वह जांच एजेंसी ऐसा कौन सा काम कर देगी कि किसी राज्य की सरकार की निजता भंग हो जाएगी। देश की अखंडता को खतरे में डालने वाला व्यक्ति देश के किसी भी कोने का हो, अगर वह पकड़ा जाता है तो, भला किसी को क्यों बूरा लगना चाहिए। इस बिल में एन आई ए के इन्स्पेक्टर स्तर के अधिकारी को भी जांच के लिए अधिकृत कर दिया गया है। पहले इसके ऊपर के अधिकारी ही जांच करते थे। इस बिल को पारित करने के पीछे का मकशद सिर्फ इतना ही हो सकता है कि किसी तरह से आतंकावादी गतिविधियाँ रुकें। आज के कुछ युवा आसानी से जिन आतंकवादी संगठनों के प्रलोभन में फंस कर अपने ही देश के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, उस पर लगाम लगे। देश कई वर्षों से देख रहा है कि किस तरह कुछ युवा भटक कर उन आतंकवादी संगठनों से जुड़ गए थे। आज विपक्ष दलील दे रहा है कि कोई निर्दोष इस कानून का शिकार हो गया और जेल चला गया तो उसके घर वालों पर क्या गुजरेगी। पांच साल ,दस साल या पंद्रह साल के बाद पकड़ा गया व्यक्ति निर्दोष साबित हुआ तो उसकी भरपाई कैसे होगी। उसके पुराने दिन कैसे वापस किये जायेंगे। विपक्ष की आशंका हो सकता है अपनी जगह सही हो लेकिन विपक्ष को यह भी तो पूछना चाहिए कि जब कोई युवा भटक कर किसी आतंकवादी संगठन से जुड़ जाता है, तब उसके घर वालों पर क्या गुजरती है। उसके घर वालों को किनकिन मुशिबतों का सामना करना पड़ता है। आसपास के लोगों से कैसे कैसे ताने सुनने पड़ते हैं। प्रकृति के नियम से भी कभीकभी किसी को तकलीफ होती है। अगर मुसलाधार बारिश हो रही हो तो कोठी और बंगलों में रहने वाला आदमी खुश होता है, जबकि झुगियों में रहने वाला व्यक्ति भगवान् से बारिश बंद होने की गुहार लगाता है। अब ऐसे में झुगी वाले व्यक्ति के परेशान होने से बारिश बंद तो नहीं हो जायेगी। लिहाजा विपक्ष यू ए पी ए का विरोध बंद कर अब इस पर ध्यान दे कि जिस मकशद से यह कानून लाया गया है, उस पर यह खरा उतर रहा है कि नहीं। उसका अनुपालन हो रहा है कि नहीं। खासकर जम्मू कश्मीर में जिस तरह से युवा पत्थरबाजी में शामिल हो रहे हैं, उसमे कमी आये। क्योंकि यह कानून उन पर अंकुश लगाने में शायद कामयाब हो जायेगा। यह कानून जम्मू कश्मीर के युवाओं के लिए ज्यादा मुफीद है।  क्योंकि देश के अन्य राज्यों के युवाओं की भटकने की शिकायतें बहूत कम है, जबकि जम्मू कश्मीर में बहूत ज्यादा है। प्रत्यक्ष रूप से कहा जाए तो यह कानून भी उन्ही युवाओं के लिए बनाया भी गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जम्मू कश्मीर के युवा आतंकवादियों के बहकावे में न आवें। मुख्य धारा से जुड़ें और अपने राज्य और देश की प्रगति में हाथ बढ़ाएं। देश के अन्य राज्यों के साथसाथ जम्मू कश्मीर के लोगों और खासकर वहां के युवाओं को एक बात भली भाँती समझ लेनी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह उनके दुश्मन नहीं हैं।