अब प्रधान जाएंगे जेल ?

अब प्रधान जाएंगे जेल ?

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव होने हैं। पिछला चुनाव 2015 में हुआ था । अगले वर्ष होने वाले इन चुनावों के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। लेकिन इस बीच सरकार ने एक निर्देश जारी कर सभी निर्वाचित और चुनाव लड़ने वाले संभावित प्रत्याशियों की नींद उड़ा दी है। ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव से पहले सभी ग्राम प्रधानों के संपत्ति की जांच होगी। 2015 में चुनाव लड़ते समय उनकी संपत्ति क्या थी और इस समय उनकी आर्थिक स्थिति क्या है, सरकार इसका ब्यौरा इकठ्ठा करेगी। यानि कुल मिलाकर उन ग्राम प्रधानों की अब खैर नहीं जिन्होंने अनाप-सनाप पैसे कमाए हैं। कुछ माह पूर्व जहाँ प्रधानों को मिल रहे भत्ते को बढाने की बात सामने आई थी वहीँ अब उनकी कुंडली खंगालने की बात की जा रही है। माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले चुनाव से पहले कई प्रधानों को जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है।
देश की राजनीति की इकाई कही जाने वाली ग्राम पंचायतों की राज्य के विकास में अहम् भूमिका होती है। देश के किसी भी प्रदेश की सरकार की छवि बनाने और बिगाड़ने में इन पंचायतों का अहम् योगदान होता है। सरकार अगर ग्राम प्रधानों की संपत्ति की जाँच करने का फैसला कर रही है तो निश्चित तौर पर यह अच्छी पहल है। ग्राम पंचायतों का गठन जिन उद्देश्यों के लिए किया गया था, उस पर वो शायद उतना खरा नहीं उतर पा रहीं है, जितनी उनसे अपेक्षाएं थीं। जिस मकशद से ग्राम प्रधानों को जनता द्वारा जिम्मेवारी दी जाती है। अधिकाँश ग्राम प्रधान उस पर खरा नहीं उतर पाते हैं। बीते कुछ वर्षों से उनके क्रियाकलाप में भारी गिरावट आई है। ग्राम प्रधानों में आई इस गिरावट में सिर्फ उन जनप्रतिनिधियों का ही दोष है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। क्षेत्र के इनसे बड़े प्रतिनधि मसलन विधायक और  सांसद हर चुनाव में देखते हैं कि ग्राम प्रधानी के चुनाव में कैसी मारामारी होती है। प्रधान बनने के लिए एक प्रत्यासी कितने तिकड़म लगाता है। संभवतः राज्य की सरकारें भी अप्रत्यक्ष रूप से इन्हें जानती या समझती जरुर होंगी। इन छोटे चुनावों में भी एक प्रत्यासी लाखों रूपये खर्च देता है। सबकी मंशा चुनाव जीतने की होती है। यह जानते हुए भी कि ग्राम प्रधानी के चुनाव में प्रत्यासी इतने पैसे क्यों खर्च करता है, किसी ने इस तरफ ध्यान देने की कोशिश क्यों नहीं की। अब सरकार अगले चुनावों से पहले इनकी कुंडली खंगालने की बात कर रही है। यहाँ बता दें कि ग्राम प्रधानों को भत्ते के रूप में प्रतिमाह मात्र 3500 रूपये मिलते हैं। मामूली आदमी भी इस बात को समझ सकता है कि एक प्रधान जिसे अपने क्षेत्र के ब्लाक के अलावा अपने जिले के मुख्यालय पर भी जाना पड़ता है। उसे मुख्य विकास अधिकारी के दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं। प्राधनों को महीने में कई –कई बार इन स्थानों पर जाना पड़ता है। अब ये सब करने में तो प्रधानों का अच्छा ख़ासा पैसा खर्च होता ही होगा। ऐसे में एक प्रधान न चाहते हुए भी कुछ न कुछ दायें बाएं से कमाने की कोशिश जरुर करता होगा। यह सत्य है कि अब कोई भी प्रधान सेवा भाव की नियत से प्रधानी का चुनाव नहीं लड़ता। चुनाव लड़ने वाले अधिकांश उम्मीदवारों की सोच पैसा और रुतबा कमाने की ज्यादा जबकि सेवा भाव की सोच मामूली होती है। प्रधानी के स्तर से होने वाले भ्रष्टाचार को रोकना इतना सरल नहीं है जितना सरकार सोच रही है। ग्राम प्रधान अपने उपरी जनप्रतिनिधि ,जैसे ब्लाक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य ,जिला पंचायत अध्यक्ष, विधायक और सांसदों की भव्य जीवन शैली देखकर खुद को भी कुछ वैसा ही बनने की चेष्टा करने लगते हैं। लेकिन प्रधान एक बात भूल जाते हैं कि वो उन लोगों द्वारा चुने जाते हैं जो उन्ही के आस पास रहने वाले होते हैं, एक दुसरे को भली भाँती जानते हैं। प्रत्यासी और वोटर एक दुसरे के घर खानदान को भली भाँती जानते हैं। ऐसे में जब एक प्रधान महज पांच साल के अपने कार्यकाल में अपनी आर्थिक स्थिति ठीक कर लेता है तो सबसे पहले उसके करीबी ही उस पर सवाल उठाने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि जिन्होंने उसे जिताया होता है फिर वही लोग उसे हरा भी देते है।
अब सरकार उन ग्राम प्रधानों की जांच करवाने की जो बात कर रही है, उससे एक फायदा यह हो सकता है कि आने वाले चुनाव में कुछ वर्तमान प्रधान चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएँ, कुछ जांच के दौरान भ्रष्टाचार के दोषी पायें जाएँ, संभव है कुछ जेल भी चले जाएँ लेकिन इससे होगा क्या। ग्राम प्रधानी के चुनाव में प्रत्यासियों के होने वाले खर्चे कम हो जायेंगे। सरकार को अगर ग्राम पंचायतों को सुधारना ही है तो सबसे पहले उन्हें नए सिरे से कुछ पहल करनी होगी। ग्राम प्रधानों के भत्ते बढाने होंगे। चुनाव में कोई भी प्रत्यासी पैसे खर्च न कर पाए, एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी। कायदे से तो विधायकों और उस क्षेत्र के सांसद को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके क्षेत्र के किसी भी गाँव में प्रधान गलत काम न करे। ग्रामों को मिलने वाली सरकारी सहुलितों को बढ़ा दी जाये। उनकी प्रापर निगरानी हो साथ ही साथ मासिक तौर पर उनके कार्यों की समीक्षा हो। बहरहाल उत्तर प्रदेश में शायद पहली बार प्रधानों की संपत्ति की जाँच करने की बात की जा रही है। सरकार के इस फरमान से और कुछ हो न हो लेकिन एक बात तो तय है कि अगले चुनाव में संभवतः कुछ ऐसे लोग चुनाव मैदान में देखने को जरुर मिल जायेंगे जो सेवा करने की भावना से प्रधान बनना चाहते हैं।