जम्मू कश्मीर विशेष-नेहरू ने सेना को रोका और बन गया पीओके

जम्मू कश्मीर विशेष-नेहरू ने सेना को रोका और बन गया पीओके

जम्मू कश्मीर से 370 हटने के बाद देश में उत्साह का माहौल है। भाजपा नेत्रित्व वाली एनडीए सरकार के इस फैसले का स्वागत और समर्थन उन विपक्षी पार्टियों ने भी किया है जो भाजपा की कट्टर विरोधी थीं। लेकिन इस मसले पर कांग्रेस ने अपनी भद्द पिटवा ली। कंग्रेस के विरोध करने के बावजूद उन्ही की पार्टी के कई नेताओं ने सरकार के फैसले का समर्थन कर उन्हें ठेंगा दिखा दिया। बल्कि आज पूरा देश जान गया कि देश में कांग्रेस से बड़ी गैर अनुशासित पार्टी कोई नहीं है। जम्मू कश्मीर की समस्या की जड़ कांग्रेस ही थी। देश के अधिकाँश लोग इस बात को जानते भी है, बावजूद इसके कांग्रेस शोर शराबा करती रही। बेहतर यह होता कि कांग्रेस अपनी भूल सहजता से स्वीकार कर सरकार के फैसले के साथ खड़ी हो जाती। लेकिन सही मायनों में कांग्रेस नेत्रित्व 370 के मामले में बड़ी भूल कर बैठा। 

1947 में आजादी मिलने के बाद देश के गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने सभी रियासतों को भारत में विलय करने की शुरुवात की। लगभग सभी रियासतें स्वेच्छा से भारत के साथ मिल भी गईं। कुछ ने आनाकानी की तो वहां सैन्य कार्यवाई करनी पड़ी। लेकिन जम्मू कश्मीर पर मामला आकर लटक गया। जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह थे। जवाहर लाल नेहरु और उनका परिवार जम्मू कश्मीर का ही रहने वाला था। एक तरह से जवाहर लाल नेहरु और उनका परिवार उस राज्य के रियाया थे जहाँ के राजा हरी सिंह थे। यह संभव है कि जवाहर लाल नेहरु के प्रधान मंत्री बनने के बाद हरी सिंह के मन में यह ख्याल आया हो कि नेहरु हमारे राज्य का रहने वाला है, लिहाजा उसके सामने झुकने की जरुरत नहीं पड़ेगी। संभव है कि राजा हरि सिंह को इस बात का गुमान रहा हो कि वो राजा हैं, और नेहरु को इस बात का गुमान रहा हो कि वो देश के प्रधानमन्त्री हैं। दोनों के अहम् के टकराव के चलते नतीजा यह हुआ कि जम्मू कश्मीर पर पकिस्तान समर्थित कबाइलियों ने आक्रमण कर दिया। हरी सिंह ने उसी समय प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरु को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी जब नेहरु को मिली तो उन्होंने उसे घुमाकर फेंक दिया। हरी सिंह को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन को पत्र लिखा। पत्र के जरिये नेहरु के साथ हुई सारी बातों का विवरण दिया। उन्होंने पत्र के जरिये यह भी बताया कि जम्मू कश्मीर हमारे हाथ से जा रहा है। लिहाजा कुछ कीजिये। चूँकि लार्ड माउन्टबेटन उस समय विदेश और रक्षा से जुड़े मामले देखते थे।  लार्ड माउन्ट बेटन ने गृहमंत्री सरदार पटेल को भी बुलवाया। लार्ड माउन्टबेटन ने नेहरु से कश्मीर मामले पर बात की। वहां के हालात के बारे में बताया। यह भी कहा कि कुछ कीजिये नहीं तो जम्मू कश्मीर को बचाना मुश्किल हो जायेगा। नेहरु ने असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि अभी–अभी दुसरे विश्व युद्ध से छुटकारा मिला है।  ऐसी स्थिति में युद्ध नहीं किया जा सकता। नेहरु और लार्ड माउन्टबेटन के बीच जब बातचीत चल रही थी तो वहां कर्नल रैंक के सेना के अधिकारी मानिक शा भी मौजूद थे। सरदार पटेल ने नेहरु से कहा कि जम्मू कश्मीर हमारा है कि नही, इस पर नेहरु ने कहा कि जम्मू कश्मीर बिलकुल हमारा है। इतना सुनते ही सरदार पटेल ने मानिक शा से कहा कि प्रधान मन्त्री का आदेश मिल गया है, जाइये आक्रमण कीजिये। मानिक शा फ़ौज लेकर पहुँच  जम्मू कश्मीर गए।  जम्मू कश्मीर से भारतीय सेना ने कबाइलियों को मार भगाया। पी ओ के यानि पाक अधिकृत कश्मीर में सेना युद्ध लड़ रही थी। कुछ दिन में सेना वहां भी कब्ज़ा जमा लेती, लेकिन इसी बीच नेहरु ने युद्ध रोकने का आदेश दे दिया। सेना की तरफ से कहा भी गया कि बस कुछ दिन की बात है, पी ओ के भी हमारे कब्जे में होगा लेकिन नेहरु ने सेना की बात नहीं मानी। नतीजा यह हुआ कि आज पी ओ के हमारे देश के लिए कलंक बना हुआ है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का इस्तेमाल पाकिस्तान आतंकवादियों के लिए करता है। कई आतंकवादी संगठन वहां फल फूल रहे हैं। कहने के लिए कश्मीर को वो हिसा आज पकिस्तान के कब्जे में है लेकिन पकिस्तान ने वहां कभी भी कुछ ऐसा करने का प्रयास नहीं किया जिससे कि वहां के लोग शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें। नेहरु ने एक गलती सेना को रोक कर की, दूसरी गलती वहां 370 लगाकर की। यानि नेहरु ने उसे विशेष राज्य का दर्जा दे दिया। उन्होंने एक बार भी नहीं सोचा कि देश की तमाम रियासतें जो भारत में मिल गईं थीं, उनमे भी कई ऐसे राज्य थे जिन्हें विशेष दर्जे की आवश्यकता थी। लेकिन नेहरु ने वो मेहरबानी सिर्फ जम्मू कश्मीर पर की। बल्कि मेहरबानी कहना गलत होगा, उन्होंने वो काम कर दिया जो आज नासूर बन गया है। जिस समय वहां 370 लगाईं गई और बाद में 35 ए को जोड़ा गया। उस समय नेहरु ने पूरे देश को यही बताया था कि जम्मू कश्मीर को दी गईं सुविधाएं अस्थाई हैं, धीरे–धीरे ख़तम हो जायेंगी। देश में सबसे ज्यादा शासन कांग्रेस ने किया। कांग्रेस यह जानती थी कि जम्मू कश्मीर में 370 अस्थाई तौर पर लगाईं गईं हैं बावजूद इसके कांग्रेस ने कभी भी उसे हटाने का प्रयास नहीं किया। आज जब मोदी की सरकार ने 370 को ख़तम कर दिया तो कांग्रेस चिल्ल्ला रही है। कांग्रेस ऐसा करके न तो नेहरु के कथन को सही साबित करने की कोशिश कर रही है और न ही सरकार के एक सही फैसले का समर्थन कर रही है। उलटे कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी, गुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन चौधरी इस फैसले को असंवैधानिक बताकर देश के लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही साथ जम्मू कश्मीर के कुछ खुराफाती लोगों के हौसलें बढ़ा रहे हैं। ऐसे में अगर पाकिस्तान, भारत के साथ युद्ध करने की शुरुवात कर दे और जवाब में भारत भी पकिस्तान पर आक्रमण कर दे तो संभव है कि  कांग्रेस कहीं यह न कह दे कि पाकिस्तान को जवाब देना भी असंवैधानिक है। आज पाकिस्तान ने भारत के उच्चायुक्त को वापस भेजने की बात की है। बौखलाहट में कल वो आतंकवादियों से यह भी कह सकता है कि जम्मू कश्मीर में फिर से आतंक फैलाओ। जिस तरीके से पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों में भी अब दखल देने लगा है उसके बाद कम से कम कांग्रेसियों को अपना बयान बदल देना चाहिए। उन्हें राजनीति से ऊपर उठकर अपनी ही पार्टी के कुछ स्वार्थी नेताओं को दरकिनार कर पकिस्तान से कहना चाहिए कि भारत को लेकर अगर पकिस्तान कोई बात कहेगा तो कांग्रेसी सरकार के साथ खड़े नजर आयेंगे। राजा हरि सिंह के बेटे और कांग्रेसी नेता कर्ण सिंह ने सरकार के फैसले का समर्थन कर एक संदेश दे भी दिया है । देश में कई पार्टियाँ हैं, आपस में मत भिन्नता होना संभव है लेकिन देश के सम्मान के मामले पर सभी पार्टियों की यह सोच होनी चाहिए कि वो दुनिया को बताएं कि हम घर में भले ही आपस में लड़ लेंगे लेकिन देश की बात होगी तो हम सभी साथ हैं। इतने गंभीर और संवेदनशील मामले पर कांग्रेस के विरोध का नतीजा यह हुआ कि उसी की पार्टी के कई नेता सरकार के फैसले के समर्थन में खड़े हो गए हैं। हरियाण में युवा कांग्रेस के कार्यकर्त्ता राहुल गांधी का विरोध कर रहें हैं। एक तरह से देखा जाय तो आज  कांग्रेस में अनौपचारिक रूप से दो फाड़ हो गए हैं। कांग्रेस सिर्फ अपने एक नेता गुलाम नबी आजाद की वजह से अपनी छीछालेदर करवा रही है। बेहतर यही होता कि कम से कम कश्मीर मामले पर अभी भी वो सरकार के साथ खड़ी होकर देश को यह बताने का प्रयास करे कि राष्ट्रीय स्तर के मामलों पर सभी राजनैतिक पार्टियाँ एक हैं।