जम्मू कश्मीर विशेष -लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई

जम्मू कश्मीर विशेष -लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई

जम्मू कश्मीर पर पिछले एक सप्ताह से संसय बना हुआ था। जम्मू कश्मीर में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती और अमरनाथ यात्रियों को तुरंत वापस लौटने का आदेश देकर केंद्र सरकार ने देश के लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। देश के लोग सरकार के किसी सकारात्मक फैसले की उम्मीद लगाए हुए थे। जम्मू कश्मीर को लेकर जिस बड़े फैसले की सुगबुगाहट सुनाई दे रही थी, उसे आज देश के गृहमंत्री अमित शाह ने सूना ही दी। सोमवार को जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटा दी गई। अब जम्मू कश्मीर से राज्य का दर्जा छिन गया। यानि अब वहां का सारा अधिकार देश के राष्ट्रपति के हाथों में होगा।

पिछले सत्तर साल से जम्मू कश्मीर पर चर्चा हो रही थी। अलग–अलग मंचों पर धारा 370 को लेकर बड़ी–बड़ी बहसें होती रहीं। आजादी के बाद केंद्र में जब भी कोई नई सरकार बनती उससे एक ही सवाल होता कि जम्मू कश्मीर से धारा 370 कब हटेगी। देश के करोड़ों लोगों के दिल में यह सवाल वर्षों से कुलबुला रहा था। देश के करोड़ों लोग यह नहीं समझ पाते थे कि ऐसी कौन सी मजबूरी है, जिसके चलते जम्मू कश्मीर से धारा 370 नहीं हटाई जा पा रही है। जबकि धारा 370 जम्मू कश्मीर में अस्थाई रूप से लगाईं गई थी। इसका मतलब यह होता है कि उसे कभी भी हटाया जा सकता है। लेकिन किस मजबूरी के तहत उसे नहीं हटाया जा रहा है। जबकि जम्मू कश्मीर की व्यवस्थाएं व्यावहारिक नहीं थीं। हमारे देश का अंग होने के बावजूद वहां की व्यवस्था देश के संविधान के अनुरूप कभी भी नहीं रहीं। उदहारण के तौर पर अब तक वहां के लोगों के पास दोहरी नागरिकता होती थी। यानि एक नागरिक भारत का और दूसरा नागरिक जम्मू कश्मीर का। संविधान का नियम 356 वहां लागू नहीं होता था। इस नियम के तहत देश के राष्ट्रपति किसी भी राज्य के संविधान को भंग कर सकते हैं, लेकिन जम्मू कश्मीर के लिए राष्ट्रपति यह आदेश वहां वहां लागू नहीं होता था। एक नियम 360, जिसके तहत किसी भी राज्य में वित्तीय आपातकाल लगाया जा सकता है। जम्मू कश्मीर में 360 नियम लागू नहीं होता था। इसी तरह देश का हिसा होने के बाद भी जम्मू कश्मीर का राष्ट्र ध्वज उनका खुद का है। वहां के लोगों का हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना अनिवार्य नहीं होता था। पूरे देश की विधान सभाओं का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है जबकि जम्मू कश्मीर विधान सभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता था। जिस सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एक नजीर बनती है, उस सुप्रीम कोर्ट का फैसला वहां मान्य नहीं था। यही नहीं देश के लोगों का एक संवैधानिक अधिकार बल्कि लोकतान्त्रिक हथियार आर टी आई भी वहां लागू नहीं थी। सी ए जी वहां कुछ नही कर सकता था। यानि देश का एक ऐसा राज्य जहाँ इतनी विसंगतियां थीं और उन विसंगतियों को देश के लोग पिछले सत्तर साल से झेल से रहे थे। देश का मुकूट कहे जाने वाले जम्मू कश्मीर के मुकूट पर इतना बड़ा कलंक था। उस पर इतना बड़ा दाग लगा था। आज न सिर्फ वो दाग धुल गया बल्कि जम्मू कश्मीर का मुकूट भी चमकने लगा। जम्मू कश्मीर को अब केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। साथ ही साथ लद्दाख को इससे अलग कर केंद्र शासित का दर्जा दे दिया गया। अब जम्मू कश्मीर में जो कुछ भी होगा देश के राष्ट्रपति के अनुसार ही होगा। वहां की विधान सभा का एक तरह से अस्तित्व अब पूरी तरह से उप राज्यपाल के हाथों में होगा।

हालांकि कांग्रेस, सपा समेत कई दलों ने जम्मू कश्मीर पर लाये गए प्रस्ताव का विरोध किया। लेकिन अधिकाँश दलों ने इसका समर्थन किया। बसपा जैसी पार्टी ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। सोमवार का दिन और 5 अगस्त 2019 शायद आजादी के बाद पहला ऐसा दिन और पहली ऐसी तारीख है जिसे देश की आने वाली पीढियां शायद कभी नहीं भूल पाएंगीं। जम्मू कश्मीर के बारे में अक्सर यह कहा जाता था कि लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पायी। लेकिन अब शायद यही कहा जायेगा कि लम्हों ने नहीं, बल्कि किसी के गलत निर्णय और गलत सोच के चलते देश के माथे पर जम्मू कश्मीर जैसा कलंक लगा था जो अब हट गया। अब शान से जम्मू कश्मीर जाइये और शान से कहिये जम्मू कश्मीर हमारा है।