'56 जे, की नकेल

'56 जे, की नकेल

केंद्र या देश की तमाम राज्यों की सरकारों को बेहतर तरीके से चलाने में ब्यूरोक्रेसी का बहूत बड़ा हाथ होता है। देश की तमाम राजनैतिक पार्टियाँ एक तरह से इन्ही पर निर्भर होती हैं। सरकार किसी भी पार्टी की हो वगैर इनको विश्वास में लिए उनका शासन बढ़िया हो नहीं सकता। इतनी महवपूर्ण भूमिका होने के बावजूद अधिकाँश ऐसे अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं। जबकि आरोपों के घेरे में आती हैं केंद्र या राज्यों की सरकारें। क्योंकि जनता के प्रति जवाबदेही उन्ही राजनैतिक पार्टियों की होती हैं, जिनकी सरकारें होती हैं। जबकि सरकारों को बदनाम करने में सीधे–सीधे इन्ही आधिकारियों का हाथ होता है। ऐसा कहने का यह कतई मतलब नहीं कि राजनेता बेदाग़ हैं या वो भ्रष्ट नहीं होते। जबसे केंद्र में मोदी की सरकार बनी है, तबसे नियम 56 जे आजकल चर्चाओं में हैं। कुछ साल पहले तक इस नियम को देश के बहूत कम लोग ही जानते थे। लेकिन यह नियम देश के भ्रष्ट अधिकारियों को सबक सिखाने और उन्हें उनकी सेवा से निवृत करने का अधिकार देता है। देश के प्रधानमंत्री मोदी ने इस नियम के तहत अपने पहले कार्यकाल यानी 2014 से 2019 तक कई अधिकारियों को रिटायर कर दिया था। भ्रष्ट अधिकारियों को रिटायर करने का सिलसिला उनके दुसरे कार्यकाल में बदस्तूर जारी है। सोमवार को भी आयकर विभाग के ऐसे 22 अधिकारियों को रिटायर किया गया, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
केन्द्रीय सेवा का सामान्य वित्त नियम 56 सरकार को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐसे अधिकारी को उनकी सेवा से मुक्त कर दे, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। यह नियम आई ए एस, आई पी एस, ग्रुप ए के अधिकारियों के साथ –साथ गैर राजपत्रित अधिकारियों पर लगता है। इस नियम के तहत सरकार उन अधिकारियों को जबरन रिटायर कर सकती है जिनकी उम्र 50 साल से ऊपर हो गई हो या कम से कम 25 वर्ष की नौकरी कर चुके हों। हालांकि यह नियम बहूत पहले से है लेकिन मोदी सरकार से पहले इस नियम के तहत किसी अधिकारी पर गाज गिरी हो, शायद ही किसी को याद हो। वर्षों से लोग सुनते आ रहें हैं कि फलां अधिकारी के पास इतनी संपत्ति है, फलां अधिकारी ने अकूत धना कमा लिया है। लेकिन लोग बस उन अधिकारियों के बारे में सुनते ही थे। उनके साथ होता क्या था, किसी को पता नहीं चलता था। ऐसे आरोपी अधिकारी रिटायर होकर बड़े आराम से अपना जीवन व्यतीत करते थे। गौर से देखने पर आज भी बहूत से अधिकारी किसी भी शहर की बड़ी कालोनी में बने अपने बड़े बंगले में आराम से रहते हुए दिख जायेंगे। मोदी के दुसरे कार्यकाल में वित्त मंत्रालय ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड के 12 वरिष्ठ अधिकारियों को रिटायर कर यह सन्देश दे दिया था कि भ्रष्ट अधिकारियों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जायेगा। अब 22 ऐसे वरिष्ठ कर अधिकारियों को जबरन रिटायर किया गया है जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। सरकार की यह कोशिश है कि किसी भी विभाग में साफ़ सुथरे अधिकारी हों। साथ ही साथ ऐसे अधिकारी जिन्होंने अवैध और बेहिसाब संपत्ति बना राखी हों वो घर जाएँ। ताकि कुछ अन्य लोगों को उनकी जगह पर नियुक्त किया जा सके। नियम 56 इतना इतना प्रभावशाली है बावजूद इसके पहले की सरकारें इसका इस्तेमाल क्यों नहीं करती थीं, आज यह एक यक्ष प्रश्न है। जवाब कुछ भी हो सकता है लेकिन अगर पहले की सरकारें इन नियम के तहत कार्यवाई नहीं करती थी तो कहीं न कहीं यह जरुर समझा जायेगा कि संभव हो कि पहले की सरकारें भी उन जैसे अधिकारियों के जरिये अपना भी काम करती रही हों। उन जैसे अधिकारियों की बदौलत खुद भी अवैध कमाई करती रहीं हों। बहरहाल आज देश भर के अधिकारियों के मन में एक दहशत है। खासकर उन अधिकारियों के मन में जो कहीं न कहीं कुछ गलत करने की मानसिकता के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन सरकार को इस नियम का दुरुपयोग करने वालों से भी सावधान रहना होगा। क्योंकि जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगेंगे, उनकी जांच भी कोई न कोई अधिकारी ही करेगा। जांच करने वाला अधिकारी किसी निर्दोष को बदले की भावना से फंसा न दे।